वर्षा, यज्ञ और तप का संदेश-अथर्ववेद के मंत्रों से स्वामी राम स्वरूप जी का प्रेरक उपदेश
- DSS Admin
- Jun 07, 2026
कठुआ, 07 जून (हि.स.)। वेद मन्दिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 57वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने अथर्ववेद काण्ड 4 के मंत्रों के माध्यम से श्रद्धालुओं को गहन आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक संतुलन का संदेश दिया।
अपने प्रवचन में उन्होंने बताया कि प्रभु से प्रार्थना की गई है कि आकाश में मेघों की शक्ति बढ़े, जिससे देश में पर्याप्त वर्षा हो और पृथ्वी पर शुद्ध जल की प्राप्ति सुनिश्चित हो सके। वर्षा से अन्न, फल एवं औषधियों की उत्पत्ति होती है जो समस्त प्राणियों के जीवन की रक्षा करती है।
उन्होंने कहा कि जल के बिना जीवन असम्भव है इसलिए वर्षा का विशेष महत्व है। स्वामी जी ने अथर्ववेद के मंत्रों का उल्लेख करते हुए मेंढक और ब्राह्मण की वाणी की अद्भुत तुलना समझाई। उन्होंने बताया कि जैसे ब्राह्मण वर्षभर एकांत में रहकर वेदों का अध्ययन करते हैं और फिर उनका उच्चारण करते हैं उसी प्रकार मेंढक भी वर्षा आने तक मौन रहते हैं और वर्षाकाल में ध्वनि करते हैं। यह उदाहरण मनुष्यों को तप, संयम और साधना का संदेश देता है। उन्होंने आगे कहा कि जिज्ञासु व्यक्ति यदि वर्षभर एकांत में रहकर तप और साधना करता है तो वह ब्राह्मण के समान ज्ञान प्राप्त कर सकता है। साथ ही मेंढकों के माध्यम से वर्षा के स्वागत का भाव भी व्यक्त किया गया है जैसे बालिका अपनी माता को पुकारती है।
प्रवचन में यह भी बताया गया कि परमेश्वर सूर्य की किरणों के माध्यम से पृथ्वी के जल को ऊपर उठाकर वर्षा के रूप में पुनः धरती पर बरसाता है। यह प्राकृतिक चक्र जीवन के संरक्षण का आधार है। अंत में स्वामी जी ने “यज्ञम् तन्वताम्” मंत्र का उल्लेख करते हुए घर-घर यज्ञ करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यज्ञ और वर्षा से उत्पन्न औषधियाँ प्राणियों को आनंद प्रदान करती हैं और जीवन को सुखमय बनाती हैं। उन्होंने निष्कर्ष रूप में कहा कि परमेश्वर ने वर्षा के नियमों के साथ मनुष्यों को तप, संयम और प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा दी है।
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