खेतों में पराली जलाना पड़ेगा भारी, अब 15 हजार तक जुर्माना
- DSS Admin
- May 28, 2026
धमतरी, 28 मई (हि.स.)। धान कटाई के बाद खेतों में पराली जलाने की बढ़ती घटनाओं ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। अंचल में लगातार मिल रही शिकायतों और खेतों से उठते धुएं के गुबार के बीच अब जिला प्रशासन अब पराली जलाने वालों पर कार्रवाई करने की तैयारी में है। प्रशासन ने कहा है कि खेतों में फसल अवशेष जलाने वाले किसानों से 15 हजार रुपये तक का अर्थदंड वसूला जाएगा।
धमतरी जिले के चारों ब्लाक में इन दिनों किसान फसल अवशेष पराली जला रहे हैं। इससे आगजनी की घटना घटित हो सकती है। बीते दो दिन पूर्व कुरुद ब्लाक में पराली के कारण आगजनी की घटना घटित हुई थी, जिसे कृषि विभाग की टीम ने रोका था। अब प्राशासन सीधे कार्रवाई के मूड में है।
जानकारी के अनुसार प्रशासन के अनुसार 0.80 हेक्टेयर तक भूमि रखने वाले किसानों पर 2500 रुपये, 0.80 से 2.02 हेक्टेयर तक 5000 रुपये तथा 2.02 हेक्टेयर से अधिक रकबा होने पर 15 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाने से खेत की ऊपरी उपजाऊ परत को भारी नुकसान पहुंचता है। इससे मिट्टी में मौजूद लाभदायक सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं और भूमि की उर्वरक क्षमता कम हो जाती है। एक टन पराली जलने से लगभग 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फास्फोरस, 25 किलो पोटाश और 1.2 किलो सल्फर नष्ट हो जाता है। इसके अलावा केंचुए और मित्र कीट भी मर जाते हैं, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है और किसानों को बाद में अधिक मात्रा में रासायनिक खाद का उपयोग करना पड़ता है।
नगरी ब्लाक में भी पराली जलाने की घटना सामने आई है
धमतरी जिले के धमतरी, कुरुद ब्लाक की तरह नगरी ब्लाक के नगरी, सिहावा, सेमरा, बेलर, बिरगुड़ी, भूमका, भुरसीडोगरी, नवागांव, सांकरा सहित आसपास के गांवों में रबी फसल के बाद खेतों में पराली जलाने की घटनाएं सामने आई हैं। इसके बाद राजस्व और कृषि विभाग की टीम सक्रिय हो गई है। कुछ किसानों के खिलाफ पंचनामा तैयार कर कार्रवाई प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। गांवों में कोटवारों के माध्यम से मुनादी कर किसानों को पराली नहीं जलाने की चेतावनी दी जा रही है।
पराली जलाना पर्यावरण के लिए नुकसानदेह
कृषि उप संचालक मोनेश साहू ने किसानों से अपील करते हुए कहा कि पराली जलाना पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए घातक है। इससे निकलने वाली मीथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें वातावरण को प्रदूषित कर ग्रीन हाउस प्रभाव बढ़ाती हैं। धुएं में मौजूद तत्व फेफड़ों और स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालते हैं। उन्होंने बताया कि फसल अवशेषों को जलाने के बजाय खेत में ही जुताई कर हल्की सिंचाई करने से 15 से 20 दिनों में पराली जैविक खाद में बदल जाती है। इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए यूरिया का छिड़काव भी किया जा सकता है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है और अगली फसल में रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम पड़ती है, जिससे खेती की लागत में भी कमी आती है।

