हरगिला (बड़ा गरूड़) संरक्षण, क्या भागलपुर एक बड़ा अवसर खो रहा है?

भागलपुर, 03 जुलाई (हि.स.)। असम ने हरगिला को केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि अपनी पहचान बना लिया। कभी जिसे अशुभ मानकर उसके घोंसले वाले पेड़ काट दिए जाते थे, आज उसी हरगिला के संरक्षण का मॉडल पूरी दुनिया में सराहा जा रहा है। इसका बड़ा श्रेय पूर्णिमा देवी बर्मन और स्थानीय समुदाय को जाता है।

लेकिन भागलपुर का सवाल आज भी अनुत्तरित है। गंगा के किनारे और आसपास के क्षेत्रों में हरगिला (बड़ा गरूड़) की उपस्थिति होने के बावजूद क्या हम उसके संरक्षण को जन-आंदोलन बना सके? क्या स्थानीय समुदाय, विशेषकर महिलाओं, विद्यालयों और युवाओं को इस अभियान से जोड़ने का गंभीर प्रयास हुआ? क्या हरगिला के घोंसलों, प्रजनन स्थलों और आवासों की नियमित निगरानी और सुरक्षा सुनिश्चित हो सकी ?

सच्चाई यह है कि संरक्षण केवल पक्षियों की गिनती कर लेने या शोधपत्र प्रकाशित कर देने से नहीं होता। वास्तविक संरक्षण तब होता है जब समाज स्वयं उस प्रजाति की सुरक्षा का जिम्मा उठाने लगे।

पक्षीविद सह पर्यावरण विशेषज्ञ दीपक कुमार उर्फ झुन्नू बताते हैं कि भागलपुर में हरगिला (बडा गरूड़) संरक्षण की दिशा में निश्चित रूप से प्रयास हुए हैं, लेकिन वे व्यापक जनभागीदारी, संस्थागत सहयोग और निरंतर जनजागरूकता के स्तर तक नहीं पहुँच सके। यही कारण है कि आज भी हरगिला आम लोगों की चर्चा का विषय नहीं बन पाया है। यह किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक कार्यशैली पर आत्ममंथन का अवसर है।

यदि असम एक सफल मॉडल बन सकता है, तो (भागलपुर) बिहार भी बन सकता है। बशर्ते संरक्षण को कुछ लोगों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का ससक्त अभियान बनाया जाए। अब समय आ गया है कि बड़ा गरूड़ (हरगिला) को केवल एक दुर्लभ पक्षी नहीं, बल्कि भागलपुर की प्राकृतिक धरोहर और गौरव के रूप में स्थापित किया जाए।

   

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