परस्पर सामंजस्य और जमीनी वास्तविकताओं के आधार पर भाषा समस्या का समाधान संभव : बंधु तिर्की

रांची, 17 मई (हि.स.)। पूर्व मंत्री एवं झारखण्ड सरकार की समन्वय समिति के सदस्य बंधु तिर्की ने कहा है कि परस्पर सामंजस्य और जमीनी वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए ही राज्य में जारी भाषा विवाद का समाधान किया जा सकता है। तिर्की ने कहा कि आपसी मतभिन्नता अपनी जगह पर पूरी तरीके से सही है लेकिन कटुता के आधार पर भाषा संबंधित मामले का समाधान नहीं हो सकता।

रविवार को राजधानी रांची में अपने आवास पर प्रेस वार्ता में तिर्की ने कहा कि उनके मंत्रित्व काल में 1 अप्रैल 2011 को जारी अंधिसूचना संख्या 1632 में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संबंधी मामले का जिस प्रकार से समाधान सुझाया गया था उससे बेहतर समाधान नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि उस अधिसूचना को तैयार करने से पूर्व विशेषज्ञ समिति में राज्य के विख्यात जनजातीय भाषाविद एवं झारखण्ड के समाज को समझने वाले अनेक लोग थे।

तिर्की ने कहा कि राज्य में अनेक सीमावर्ती जिले वैसे हैं जहाँ भोजपुरी, अंगिका जैसी भाषायें बोली जाती है और सरकार द्वारा 2011 में जारी उस वर्णित अधिसूचना में उन सभी बातों का पूरा ध्यान रखा गया था। लेकिन कुछ लोगों ने जैसे सरकार के ऊपर दोषारोपण करने को ही अपनी जिम्मेदारी समझ लिया है। तिर्की ने कहा कि जिस भोजपुरी एवं अंगिका को बिहार में भी आधिकारिक रूप से वैसी मान्यता नहीं दी गयी है उसे झारखण्ड में मान्यता दिलाने के नाम पर कुछ लोग अनावश्यक विवाद पैदा कर रहे हैं जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

तिर्की ने कहा कि बिहार के रोहतास, पूर्णिया, पश्चिमी चंपारण आदि में भी उरांव जनजाति की बड़ी आबादी रहती है जिसकी कुड़ुख भाषा है और जिनकी अपनी संस्कृति है। इसके अतिरिक्त बिहार में संथाल जनजातीय समुदाय के लोग बड़ी संख्या में पूर्णिया, कटिहार, मुंगेर आदि जिलों में रहते हैं। जबकि बिहार में संथाली और कुड़ुख भाषा को मान्यता नहीं दी गयी है। जो लोग अनावश्यक विवाद पैदा करते हैं उन्हें पहले बिहार में कुड़ुख और संथाली भाषा को मान्यता दिलवानी चाहिये। साथ ही बिना बात के अनावश्यक रूप से राई का पहाड़ नहीं बनाना चाहिये।

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