


सारण, 27 नवंबर (हि.स.)। बिहार की मिट्टी में रची बसी गुड़ की जलेबी आज भी सारण जिले के सुदूर गांवों से लेकर कस्बों और शहरों के चौक-चौराहों तक अपनी खास जगह बनाए हुए है। यह सुनहरी मिठाई केवल स्वाद का अनुभव नहीं बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और भव्य उत्सवों की मिठास समेटे हुए है। दिवाली, दशहरा, और राम नवमी जैसे बड़े पर्वों पर तो लगभग हर घर में यह मिठाई खाने को मिल जाती है।
सोनपुर निवासी संग्राम सिंह बताते है कि इस गुड़ की जलेबी का प्रचलन तब अपने चरम पर था जब कच्चे सड़कों के कारण मेलों और त्योहारों में धूल उड़ती थी। गुड़ में मौजूद औषधीय गुणों के कारण लोग इसका उपयोग दवा के रूप में करते थे। विशेष रूप से रेत, धूल-मिट्टी और कच्ची सड़कों से सटे हाट-बाजारों में इसकी उपलब्धता बहुत अधिक रहती थी।
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य राम दयाल शर्मा के अनुसार प्राचीन काल में चीनी के आविष्कार से पहले गुड़ ही मिठास का प्रमुख स्रोत था। यही वजह है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गुड़ की जलेबी को एक अलग और विशेष स्थान प्राप्त है। एक समय था जब इस गुड़ की जलेबी को गरीब की मिठाई या सिर्फ जाड़े की मिठाई के रूप में देखा जाता था। लेकिन आज के आधुनिक और बदलते दौर में जब उपभोक्ता देसी और प्राकृतिक स्वाद की तलाश में है तब उनका खिंचाव स्वत: ही गुड़ की जलेबी तरफ हो जाता है। यह मिठाई बड़े शहरों की हाई- टेक दुकानों से लेकर छोटे कस्बों के चट्टी- नुक्कड़ों तक एक पारम्परिक और स्वस्थ विकल्प के तौर पर अपनी पहचान बना रही है। गांव के बुजुर्ग, विद्वान, और यहाँ तक कि कई डॉक्टर भी इसे चीनी की जलेबी से बेहतर और स्वस्थ विकल्प मानते हैं।
पिछले कई वर्षों से जलेबी बेच रहे विक्रेता धर्मेंद्र शाह बताते हैं, हम मैदा के घोल को पारंपरिक तरीके से फेंटकर 24 घन्टे के लिए छोड़ देते हैं और फिर उसी मैदे के घोल को सुनहरा होने तक तलते हैं। इसके बाद इन्हें ताजे गुड़ की चाशनी में डुबोया जाता है जो इसे वह खास देसी स्वाद देता है। मेले के नखास, हरिहरनाथ मंदिर रोड, और चिड़िया बाजार जैसे क्षेत्रों में इसकी दुकानें सजती हैं। धर्मेंद्र साह बताते हैं कि जलेबी ₹100 से ₹160 रुपये प्रति किलो तक बिकती है और श्रद्धालु इसे 1-2 किलो तक खरीदकर अपने घर ले जाते हैं।
यह देसी मिठाई आज भी यहाँ आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी मिठास से मजबूती से जोड़े हुए है। गुड़ की जलेबी सारण की विरासत का एक मीठा अध्याय है, जो आधुनिकता के दौर में भी अपनी औषधीय महत्ता और देशी पहचान बनाए हुए है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय कुमार



