सोशल ऑडिट में कांगड़ा के स्कूलों की बदहाल तस्वीर उजागर, शिक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियों का खुलासा

धर्मशाला, 19 जून (हि.स.)।

हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा में सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) के अंतर्गत संचालित विद्यालयों के सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) में आधारभूत सुविधाओं, छात्र सुरक्षा, प्रशासनिक व्यवस्था और शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ी गंभीर कमियां सामने आई हैं। रिपोर्ट ने शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े किए हैं। इन निष्कर्षों को धर्मशाला में आयोजित जनसुनवाई के दौरान सार्वजनिक किया गया। जनसुनवाई में दो हजार से अधिक अभिभावकों, शिक्षकों, स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी) के सदस्यों, जनप्रतिनिधियों, शिक्षा विभाग के अधिकारियों तथा स्थानीय नागरिकों ने भाग लिया। उपायुक्त कांगड़ा हेमराज बैरवा भी जनसुनवाई में उपस्थित रहे और उन्होंने सोशल ऑडिट रिपोर्ट के निष्कर्षों का अवलोकन किया।

यह सोशल ऑडिट हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की टीम द्वारा डॉ. रणधीर रांटा के नेतृत्व में किया गया। टीम ने जिले के कुल 2,364 विद्यालयों में से 519 विद्यालयों का मूल्यांकन किया, जो कुल विद्यालयों का लगभग 20 प्रतिशत है। शेष विद्यालयों का आकलन आगामी चार चरणों में किया जाएगा। रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए डॉ. रणधीर रांटा ने कहा कि अध्ययन से विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था में अनेक गंभीर चुनौतियां और खामियां सामने आई हैं।

उन्होंने कहा कि रिपोर्ट स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के निर्धारित मानकों के मुकाबले कांगड़ा की विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था का प्रदर्शन निराशाजनक है। रिपोर्ट के अनुसार सर्वेक्षण में शामिल लगभग 44 प्रतिशत विद्यालयों में पर्याप्त कक्षाओं और शिक्षण एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए आवश्यक कमरों का अभाव पाया गया। वहीं 27 प्रतिशत विद्यालयों में पर्याप्त फर्नीचर उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण कई विद्यार्थियों को उचित बैठने की व्यवस्था के बिना पढ़ाई करनी पड़ रही है।

रिपोर्ट में छात्र सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंताएं सामने आई हैं।

रिपोर्ट के अनुसार 78 प्रतिशत से अधिक विद्यालयों में चारदीवारी या सुरक्षा बाड़ नहीं है, जिससे विद्यार्थियों की सुरक्षा प्रभावित हो रही है। इसके अलावा करीब 65 प्रतिशत विद्यालयों तक मोटर योग्य सड़क नहीं पहुंचती, जिसके कारण विद्यार्थियों को लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। इससे विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को भी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मूलभूत सुविधाओं की स्थिति भी चिंताजनक पाई गई। लगभग 9 प्रतिशत विद्यालयों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय उपलब्ध नहीं हैं, जबकि इतने ही विद्यालयों में पेयजल सुविधा का अभाव है। दो प्रतिशत विद्यालयों में मध्याह्न भोजन योजना के लिए रसोईघर तक उपलब्ध नहीं है।

ऑडिट टीम के सदस्य हिमांशु ने बताया कि किशोरियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। उन्होंने कहा कि 40 प्रतिशत से अधिक विद्यालयों में किशोरियों को सैनिटरी पैड उपलब्ध नहीं कराए जाते, जबकि यह उनकी नियमित उपस्थिति, स्वास्थ्य और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। रिपोर्ट में विद्यालय सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों की अनदेखी भी उजागर हुई है। लगभग एक-तिहाई विद्यालयों में शिक्षा के अधिकार कानून के तहत अनिवार्य स्कूल सुरक्षा समितियों का गठन नहीं किया गया है। इसी प्रकार एक-तिहाई विद्यालयों में शिकायत एवं सुझाव पेटियां भी उपलब्ध नहीं हैं। पुस्तकालय सुविधाओं की स्थिति भी कमजोर पाई गई।

रिपोर्ट के अनुसार 80 प्रतिशत से अधिक विद्यालय निर्धारित मानकों के अनुरूप पुस्तकालय सुविधाएं उपलब्ध कराने में विफल रहे हैं। रिपोर्ट में शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। विभागीय दिशा-निर्देशों के अनुसार अधीनस्थ शिक्षा अधिकारियों द्वारा विद्यालयों का नियमित निरीक्षण नहीं किया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार वन नेशन, ग्रेट नेशन कार्यक्रम का 48 प्रतिशत विद्यालयों में पालन नहीं किया जा रहा है।

   

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