सरकारी मूल्य पर आलू बेचने पर किसानों का हो रहा नुकसान

हुगली, 28 मार्च (हि. स.)। सरकारी मूल्य पर आलू बेचने पर आलू किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। किसानों को सरकार की ओर से प्रति बोरी दी जा रही कीमत को लेकर गुस्सा बढ़ रहा है। मौसम की अनिश्चितता के कारण आलू किसानों को पिछले कुछ वर्षों से आलू की खेती में भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए उन्होंने मांग की है कि सरकार चावल की तरह आलू के लिए भी समर्थन मूल्य निर्धारित करे। इसके साथ ही किसानों ने अन्य राज्यों को आलू निर्यात पर प्रतिबंध हटाने का भी अनुरोध किया है।

किसानों के अनुमान के अनुसार, आलू उत्पादन की लागत 465 रुपये प्रति बोरी है। और सरकार उस बोरी को 450 रुपये में खरीद रही है। इसका मतलब यह है कि किसानों को प्रति बोरी 15 रुपये का नुकसान हो रहा है।

इस वर्ष प्रति बीघा आलू का औसत उत्पादन 80 बस्ता (प्रति बस्ता 50 किलोग्राम) है। उस आलू की औसत उत्पादन लागत 440 रुपये प्रति बोरी है। इसमें बोरों की लागत, छंटाई की लागत और उन्हें कोल्ड स्टोरेज तक ले जाने की लागत शामिल है। कुल मिलाकर, प्रति बस्ता 25 रुपये अतिरिक्त खर्च आता है।

इसका मतलब है कि प्रति बस्ता कुल लागत 465 रुपये है। लेकिन सरकार कोल्ड स्टोरेज से किसानों से 450 रुपये में आलू खरीदेगी और यह प्रति बीघा 750 रुपये का नुकसान है। किसानों ने एक बीघा जमीन पर तीन महीने तक खेती की और 35 हजार से अधिक खर्च किया और आरोप है कि लाभ की जगह प्रति बीघा 750 हजार का घाटा हो रहा है।

दूसरी ओर, विदेशों को आलू निर्यात पर प्रतिबंध अभी भी लागू है, जिससे व्यापारी आलू खरीदने से कतराने लगे हैं। यदि व्यापारी आलू नहीं खरीदेंगे तो आलू के दाम कम रहेंगे और आलू किसानों को इस समय भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

हालांकि समर्थन मूल्य तय करने को लेकर कृषि विभाग का तर्क है कि समर्थन मूल्य इसलिए तय किया गया है ताकि व्यापारी किसानों से कम कीमत पर आलू न खरीद सकें, जिसका फायदा किसानों को ही होता है।

आलू व्यापारियों का कहना है कि कृषि विभाग का यह तर्क हास्यास्पद है। उनका कहना है कि यदि अन्य राज्यों को निर्यात बंद कर दिया गया तो किसानों को कभी लाभ नहीं होगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय पाण्डेय

   

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