मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देने के लिए आज जारी होगा ‘सुमन रोडमैप 2030’
- DSS Admin
- Jun 29, 2026
नई दिल्ली, 29 जून (हि.स.)। मातृ एवं नवजात मृत्यु दर में कमी लाने तथा वर्ष 2030 तक सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) हासिल करने की दिशा में केंद्र सरकार सोमवार को एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याणमंत्री जगत प्रकाश नड्डा केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद (सीसीएचएफडब्ल्यू) के 16वें सम्मेलन में ‘सुमन रोडमैप 2030’ जारी करेंगे। यह रोडमैप मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए तैयार किया गया एक व्यापक, बहुआयामी और साक्ष्य-आधारित रणनीतिक दस्तावेज है।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने सोमवार को बताया कि पिछले एक दशक में भारत ने मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन कई राज्यों और जिलों में अब भी ऐसी चुनौतियां मौजूद हैं, जिनके कारण मातृ एवं नवजात मृत्यु दर में अपेक्षित कमी नहीं आ सकी है। इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए इस रोडमैप में सभी राज्यों के लिए एक समान रणनीति के बजाय उनकी स्थानीय आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुरूप अलग-अलग कार्ययोजना बनाई गई है।
रोडमैप में गर्भधारण से पहले की देखभाल, गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, सुरक्षित प्रसव तथा प्रसव के बाद मां और शिशु की देखभाल को एकीकृत रूप से शामिल किया गया है। इसके साथ ही इसे प्रजनन, मातृ, नवजात, बाल एवं किशोर स्वास्थ्य, परिवार नियोजन और पोषण कार्यक्रमों से भी जोड़ा गया है, ताकि स्वास्थ्य सेवाएं समन्वित रूप से उपलब्ध कराई जा सकें।
इस रणनीति की प्रमुख विशेषता उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान और प्रबंधन के लिए चार-स्तरीय प्रणाली है। इसके तहत गर्भावस्था के शुरुआती चरण, विशेष रूप से तीसरी तिमाही, प्रसव के दौरान तथा प्रसव के बाद उच्च जोखिम वाली माताओं की पहचान कर उनकी लगातार निगरानी और समय पर उपचार सुनिश्चित किया जाएगा। इसके अलावा आदिवासी और दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, आपातकालीन प्रसूति सेवाओं की गुणवत्ता, परिवहन सुविधाओं तथा जलवायु परिवर्तन जैसी उभरती चुनौतियों को भी रोडमैप में शामिल किया गया है।
रोडमैप के तहत 13 उच्च प्राथमिकता वाले राज्यों—असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल—के 130 जिलों में विशेष रणनीति लागू की जाएगी। इन जिलों में गर्भवती महिलाओं का समय पर पंजीकरण, सभी आवश्यक प्रसवपूर्व जांच, गुणवत्तापूर्ण चिकित्सकीय परीक्षण तथा प्रसव के बाद पर्याप्त समय तक संस्थागत देखभाल सुनिश्चित करने के लिए ‘सुमन पैकेज फॉर प्रेग्नेंट वुमेन’ लागू किया जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि सामुदायिक स्तर पर आशा कार्यकर्ताओं द्वारा गर्भावस्था के आठवें और नौवें महीने में प्रत्येक पखवाड़े घर-घर जाकर गर्भवती महिलाओं की स्वास्थ्य जांच, खतरे के लक्षणों की पहचान, पोषण संबंधी परामर्श, सुरक्षित प्रसव की तैयारी और संस्थागत प्रसव के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रावधान किया गया है।
रोडमैप में प्रसव के बाद की महत्वपूर्ण अवधि के दौरान गर्भवती महिला के साथ रहने वाले एक नामित देखभालकर्ता के लिए वित्तीय सहायता का भी प्रस्ताव है। इसके अलावा विशेष रूप से दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में आपातकालीन रेफरल परिवहन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने तथा बर्थ वेटिंग होम, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य (एमसीएच) विंग, ऑब्स्टेट्रिक हाई डिपेंडेंसी यूनिट (एचडीयू) और आईसीयू जैसी स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थापना पर जोर दिया गया है।
सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए भी रोडमैप में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं। इनमें गर्भधारण की योजना बना रही महिलाओं को फोलिक एसिड की खुराक उपलब्ध कराना, मातृ एनीमिया और कुपोषण से निपटने के लिए व्यापक पोषण कार्यक्रम चलाना तथा गर्भावस्था से लेकर प्रसव और प्रसवोत्तर अवधि तक उच्च जोखिम वाली माताओं की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करना शामिल है।
रोडमैप में सामुदायिक भागीदारी को भी विशेष महत्व दिया गया है। इसके तहत ‘सुमन पंचायत’ की अवधारणा को बढ़ावा दिया जाएगा, जिसका उद्देश्य शून्य मातृ मृत्यु, शून्य शिशु मृत्यु, सभी गर्भवती महिलाओं की समय पर जांच, संस्थागत प्रसव और शत-प्रतिशत टीकाकरण सुनिश्चित करना है। इसके अलावा ‘मदर्स पिकनिक’ जैसी नई पहल के माध्यम से महिलाओं और समुदाय को मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों और सेवाओं के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्रालय का मानना है कि ‘सुमन रोडमैप 2030’ राज्यों और जिलों की आवश्यकताओं के अनुरूप लक्षित हस्तक्षेप, बेहतर स्वास्थ्य अवसंरचना, मजबूत सामुदायिक भागीदारी और समयबद्ध कार्ययोजना के माध्यम से मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं को नई मजबूती देगा तथा भारत को वर्ष 2030 तक मातृ एवं नवजात मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाने के लक्ष्य के करीब पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
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