पूर्वांचल में तंबाकू से होने वाले मुंह के कैंसर के खिलाफ नई उम्मीद, बीएचयू के शोधकर्ताओं ने खोजे जीनोमिक रिस्क मार्कर
- DSS Admin
- Jun 22, 2026
—पूर्वांचल के जिलों से 98 व्यक्तियों के डीएनए का हुआ व्यापक अध्ययन, अध्ययन से मुंह के कैंसर का शीघ्र निदान की खुलेगी नई दिशा
वाराणसी, 22 जून (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के शोधकर्ताओं ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के उच्च तंबाकू सेवन वाले समुदायों में ओरल स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा, मुंह के सबसे घातक कैंसर के लिए जनसंख्या-विशिष्ट जीनोमिक रिस्क मार्कर की खास पहचान की है। यह अध्ययन मुंह के कैंसर के शीघ्र निदान में एक नई दिशा खोल सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां तंबाकू का सेवन सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह शोध अध्ययन दंत चिकित्सा विज्ञान के प्रोफेसर पवन दुबे ने प्रोफेसर नीलम मित्तल के दिशा निर्देशन में किया है। इस शोध में दंत चिकित्सा संकाय के प्रोफेसर पीजी नवीन, डॉ. राहुल अगरवाल और जन्तु विज्ञान विभाग में प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे शामिल रहे। अध्ययन में पूर्वांचल (वाराणसी, गोरखपुर और आसपास के जिलों) के 98 व्यक्तियों के डीएनए का व्यापक अध्ययन किया गया है। यह शोध वैज्ञानिक पत्रिका बायोइनफार्मेशन में प्रकाशित हुई है।
सोमवार को प्रोफेसर नीलम मित्तल ने बताया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुंह के कैंसर की दर देश में सबसे अधिक है। कैंसर रजिस्ट्री डेटा के अनुसार, पुरुषों में मुंह और जीभ का कैंसर शीर्ष स्थानों पर है। यहाँ पाँच वर्षीय उत्तरजीविता दर मात्र 20-45 प्रतिशत के बीच है, क्योंकि अधिकांश मरीज स्टेज 3-4 में चिकित्सा सुविधा तक पहुंचते हैं। धूम्रपान-रहित तंबाकू (गुटखा, खैनी, जर्दा, पान मसाला) इसकी मुख्य वजह है। राष्ट्रीय औसत की तुलना में उत्तर प्रदेश में तंबाकू सेवन की दर काफी अधिक है।
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने दोहरी जीनोमिक रणनीति अपनाई। पहले सभी प्रतिभागियों का माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए प्रोफाइलिंग किया गया। फिर 40 प्रतिनिधि नमूनों (20 केस + 20 कंट्रोल) पर एक्सोम सीक्वेंसिंग किया गया। वैश्विक आबादी संरचना की तुलना के लिए 383 उच्च-कवरेज जीनोमों का भी विश्लेषण किया गया।
प्रोफेसर पवन दुबे ने बताया कि माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम के हाइपरवेरिएबल सेगमेंट में 16223C पॉलीमॉर्फिज्म मरीजों में अत्यधिक पाया गया। सांख्यिकीय विश्लेषण में यह अंतर महत्वपूर्ण था। इस पॉलीमॉर्फिज्म की अनुपस्थिति में ओरल स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा का जोखिम 8.1 गुना अधिक पाया गया। अध्ययन में यह भी पाया गया कि पश्चिमी यूरेशियन हेप्लोग्रुप वाले व्यक्तियों में ओरल स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा का खतरा अधिक था, जबकि दक्षिण एशियाई हेप्लोग्रुप के लोगों में कुछ सुरक्षात्मक प्रवृत्ति दिखी। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह वेरिएंट माइटोकॉन्ड्रियल फंक्शन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस प्रतिक्रिया को बेहतर ढंग से नियंत्रित कर तंबाकू-प्रेरित कार्सिनोजेनेसिस से बचाव कर सकता है। पूरे जीनोम सीक्वेंसिंग में तीन नए जीन का पता चला, जो विश्व के किसी भी प्रमुख कैंसर डेटाबेस या जनसंख्या डेटाबेस में पहले दर्ज नहीं थे। इससे पहले विश्व में 6 जीन की जानकारी थी, इस शोध के बाद अब 9 जीन हो गए हैं।
अध्ययन में प्रमुख लेखक बीएचयू के जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि यह अध्ययन दर्शाता है कि उत्तर भारतीय आबादी की जनेटिक संरचना वैश्विक डेटाबेस में पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं होती। पूर्वांचल जैसे उच्च बोझ वाले क्षेत्रों में मुंह का कैंसर केवल तंबाकू का परिणाम नहीं है, बल्कि आनुवंशिक संवेदनशीलता और पर्यावरणीय कारकों का जटिल अंतर्क्रिया है। हमारी खोज यह पुष्टि करती है कि हमें अपनी आबादी के लिए अलग जीनोमिक टूल्स विकसित करने होंगे। यह काम प्रिसीजन मेडिसिन की दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है। प्रो. चौबे के अनुसार यह अध्ययन इस बात को भी रेखांकित करता है कि भारतीय उपमहाद्वीप की आबादी के लिए अधिक जीनोमिक संसाधनों की आवश्यकता है, ताकि प्रिसीजन ऑन्कोलॉजी का लाभ सभी तक पहुंचे।

