वन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत: राज्यपाल

नैनीताल, 23 जून (हि.स.)। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने कहा कि वन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, पारिस्थितिक संतुलन और मानव सभ्यता के संरक्षक हैं। उन्होंने कहा कि वनकर्मी प्रकृति के सच्चे प्रहरी हैं, जो चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी वनों और वन्यजीवों की रक्षा के लिए समर्पित भाव से कार्य कर रहे हैं।

नैनीताल लोक भवन में आयोजित ‘प्रकृति के प्रहरी’ वनकर्मी सम्मान एवं पुस्तक विमोचन समारोह में राज्यपाल ने वन एवं वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले वनकर्मियों को सम्मानित किया। उन्होंने कहा कि भीषण वनाग्नि, प्राकृतिक आपदाओं और कठिन परिस्थितियों में वनकर्मी अपनी जान की परवाह किए बिना हरित संपदा की रक्षा करते हैं।

इस अवसर पर राज्यपाल ने ‘राजाजी में पूर्णिमा की वह रात’, ‘कॉमन बर्ड्स ऑफ अल्मोड़ा एंड नैनीताल’, ‘फ्रॉम रूट्स टू रिचेज’ तथा ‘बीहाइव फेंसिंग’ पुस्तकों का विमोचन किया। उन्होंने कहा कि ये पुस्तकें प्रकृति संरक्षण, जैव विविधता, आजीविका संवर्धन और नवाचार के विविध आयामों को सामने लाती हैं। राज्यपाल ने कहा कि भारतीय संस्कृति में वनों को देवतुल्य माना गया है तथा वेदों और उपनिषदों की रचना भी वनांचलों में हुई। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापवृद्धि की चुनौतियों के बीच उत्तराखंड की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य का लगभग 71 प्रतिशत भूभाग वनाच्छादित है।

उन्होंने चिपको आंदोलन और गौरा देवी के योगदान का उल्लेख करते हुए जनसहभागिता आधारित प्रकृति संरक्षण पर बल दिया। राज्यपाल ने ‘बीहाइव फेंसिंग’ जैसी पहल को मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में उपयोगी बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का उल्लेख करते हुए प्रकृति संरक्षण को जनआंदोलन बनाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में कार्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने स्वागत उद्बोधन दिया, जबकि अपर प्रमुख वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ. विवेक पांडे ने भी विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर प्रमुख वन संरक्षक (कुमाऊँ) डॉ. तेजस्विनी अरविंद पाटिल, वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, सम्मानित वनकर्मी तथा अन्य गणमान्य उपस्थित रहे।

   

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