
ऊना, 24 मार्च (हि.स.)। जहां मन की हलचल है वहां एकाग्रता नहीं हो सकती और जहां एकाग्रता है वहां मन का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, जो अपनी अंतर्यात्रा की दिशा तय कर लेता है उसे भीड़ में धक्के नहीं खाने पड़ते। विरोधाभास या भ्रम में जी कर कोई भी लक्ष्य नहीं प्राप्त किया जा सकता।
उक्त अमृतवचन श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस में परम श्रद्धेय अतुल कृष्ण जी महाराज ने पलोह, अम्ब में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा के कई प्रसंग तथ्यगत नहीं तत्वगत हैं, जो जीवन को यूं ही गंवा देते है उन्हें अंत में पश्चाताप ही करना पड़ता है। जिसे घोर संसार से पार होना है उसे भगवद् शरणागति की नौका में बैठ जाना चाहिए। जो भगवान से परम प्रेम करने लगते हैं उनके लिए मृत्यु हट जाती है। मृत्यु का कोई अर्थ ही नहीं बचता जो भागवत रस में डूब चुका है। हम अपने को देह के साथ संयुक्त समझते हैं इसीलिए मरणधर्मा मानते हैं। हम भूल ही गए हैं कि हम देह नहीं है, देह में जरूर हैं। हमें स्मरण होना चाहिए कि हम मिट्टी के दिए नहीं हैं, मिट्टी के दीए में जलती हुई चिन्मय ज्योति हैं। हमारा शरीर एक मंदिर है जिसमें आत्मा रूपी देवता विराजमान है। हमें याद रखना चाहिए कि देवता मंदिर नहीं है क्योंकि देवता के हटते ही मंदिर कचरा बन जाएगा, यह भी सच है। मगर देवता के रहते मंदिर, मंदिर है।
महाराजश्री ने कहा कि जिसे अपने और ब्रह्म के एकत्व का बोध हो जाता है उसके लिए मृत्यु का नंगा नाच बंद हो जाता है। ज्ञान हो जाने पर माता-पिता, कुटुंब, सगे-संबंधी एवं संसार से तादात्म्य अपने आप समाप्त हो जाता है। हमारे माता-पिता जब नहीं थे तब भी हम थे, हमारा शरीर जब मिट्टी में गिर जाएगा तब भी हम रहेंगे। मृत्यु पर अमृत की ही विजय हो सकती है। श्रीमद् भागवत कथा महाअमृत है। सोमवार को कथा में कर्दम देवहूति प्रसंग, भगवान कपिल का अवतार, यज्ञ भगवान का प्राकट्य, शिव पार्वती विवाह एवं ध्रुव जी को भगवत प्राप्ति का प्रसंग लोगों ने अत्यंत श्रद्धा से सुना।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / विकास कौंडल