बच्चों में तेजी से बढ़ रहा मायोपिया, चश्मे के नंबर की जांच में लापरवाही से जा सकती है आंखों की रौशनी
- DSS Admin
- Jun 17, 2026
नई दिल्ली, 17 जून (हि.स.)। मोबाइल पर घंटों बिताने की आदत छोटे बच्चों की आंखों पर को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। जिसकी वजह से बच्चों की दूर की नजर (मायोपिया) कमजोर होती जा रही है। कम उम्र में ही आंखों का नंबर लगातार बढ़ने और भविष्य में रेटिना संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इसकी पहचान और इलाज न किया जाए तो बच्चे की पढ़ाई, खेलकूद और दैनिक जीवन पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। यहां तक कि उनकी आंखों की रौशनी भी जा सकती है।
लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की निदेशक और नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ सरिता बेरी ने बताया कि मोबाइल के लगातार इस्तेमाल से मायोपिया से प्रभावित बच्चों की आंखों का नंबर हर साल औसतन 0.5 से 1 डायोप्टर तक बढ़ सकता है। कुछ बच्चों में यह बढ़ोतरी इससे भी अधिक होती है। जितनी कम उम्र में मायोपिया शुरू होता है, उतना ही अधिक नंबर बढ़ने की आशंका रहती है। लेकिन समय से जांच न होने के साथ चश्में का नंबर बढ़ता चला जाता है। चश्में का नंबर अधिक होने से भविष्य में रेटिना डिटैचमेंट, ग्लूकोमा और मोतियाबिंद जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है। उन्होंने बताया कि मायोपिया में बच्चों को दूर की चीजें धुंधली दिखाई देती है। स्कूल में ब्लैकबोर्ड पढ़ने में परेशानी के साथ साथ बार-बार आंखें मिचमिचाना, सिरदर्द और आंखों में थकान की शिकायत रहती है। बच्चों की इन शिकायतों को अभिभावकों को गंभीरता से लेना चाहिेए।
डॉ. सरिता बेरी ने बताया कि आंखों को ठीक रखने के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित रखना चाहिए। बच्चों के आंखों की नियमित अंतराल पर जांच करानी चाहिए। ताकि नंबर बढ़ने पर समय पर उपचार बदला जा सके। समय पर जांच और उपचार से मायोपिया की प्रगति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
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