- वैचारिक जागरूकता और अध्ययन पर दिया गया जोर
नई दिल्ली, 02 जुलाई (हि.स.)। साहित्यिक केंद्र द्वारका में गुरुवार को 'उजागर होता अर्बन नक्सल' विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, बुद्धिजीवियों, छात्रों और युवाओं ने सहभागिता करते हुए अर्बन नक्सलवाद की अवधारणा, उसके सामाजिक प्रभाव, वैचारिक चुनौतियों तथा उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।
इस चर्चा के दौरान संदर्भ पुस्तकों 'अर्बन नक्सल' और 'कौन हैं अर्बन नक्सल?' के आधार पर विषय के विभिन्न आयामों पर मंथन किया गया।
मुख्य वक्ता अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संगठन मंत्री मनोज कुमार ने कहा कि अर्बन नक्सलवाद प्रत्यक्ष हिंसा के बजाय वैचारिक और बौद्धिक स्तर पर कार्य करता है तथा विचारधारा के माध्यम से नए समर्थक तैयार करने का प्रयास करता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा संस्थानों, मीडिया, कला एवं साहित्य, न्यायपालिका, नौकरशाही, थिंक टैंक और राजनीति जैसे क्षेत्रों में वैचारिक प्रभाव स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि विचारधारा का विस्तार करना है। साथ ही उन्होंने अर्बन नक्सलवाद से निपटने के लिए वैचारिक जागरूकता, सतत अध्ययन और संवाद को आवश्यक बताया।
कार्यक्रम की संयोजिका प्रो. पूनम राठी ने युवाओं से अध्ययन और संवाद के माध्यम से वैचारिक रूप से सजग रहने की अपील की। द्वारका नगर बौद्धिक प्रमुख प्रवीण ने कहा कि वर्तमान समय विचारों और विमर्श का है। उन्होंने तथ्यपरक अध्ययन, तार्किक सोच और वैचारिक सजगता अपनाने पर बल देते हुए कहा कि जागरूक समाज ही राष्ट्र निर्माण की मजबूत आधारशिला बन सकता है।
साहित्य परिक्रमा की प्रबंध निदेशक डॉ. रजनी ने कहा कि अर्बन नक्सलवाद का उद्देश्य अलगाववादी शक्तियों को बढ़ावा देकर देश को कमजोर करना तथा राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता पैदा करना है। डॉ. विनीता ने कहा कि नक्सलवाद और अर्बन नक्सलवाद के स्वरूप अलग-अलग हैं तथा इस विषय पर तथ्यपरक जानकारी और स्वस्थ वैचारिक संवाद समय की आवश्यकता है।
परिचर्चा के दौरान प्रतिभागियों ने अर्बन नक्सलवाद की अवधारणा, नक्सलवाद और अर्बन नक्सलवाद के अंतर, इसके कार्यक्षेत्र, उद्देश्यों, बौद्धिक आतंकवाद तथा इससे बचाव के उपायों पर विस्तृत चर्चा की। वक्ताओं ने समाज में वैचारिक जागरूकता बढ़ाने तथा समसामयिक विषयों पर निरंतर अध्ययन और संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षाविद, छात्र, बुद्धिजीवी और युवा उपस्थित रहे।
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