शिमला : मनी लॉन्ड्रिंग में फंसाने की धमकी, डिजिटल अरेस्ट कर उड़ाए 1.18 करोड़

शिमला, 01 जनवरी (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश में “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर साइबर ठगी का एक बड़ा मामला सामने आया है। इसमें शिमला निवासी एक व्यक्ति से 1 करोड़ 18 लाख 48 हजार रुपये की ठगी की गई है। साइबर पुलिस थाना शिमला में दर्ज शिकायत के अनुसार पीड़ित को फोन और ऑनलाइन माध्यमों से संपर्क कर ठगों ने खुद को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का अधिकारी बताया और उस पर मनी लॉन्ड्रिंग, नशीले पदार्थों की तस्करी और बैंक खातों के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए।

शिकयतकर्ता के मुताबिक ठगों ने बेहद सुनियोजित तरीके से पीड़ित पर मानसिक दबाव बनाया और यह कहकर डराया कि अगर उसने तुरंत सहयोग नहीं किया तो उसकी तत्काल गिरफ्तारी कर ली जाएगी, बैंक खाते फ्रीज कर दिए जाएंगे और कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक बदनामी भी होगी। इसी डर के माहौल में पीड़ित को तथाकथित “डिजिटल सर्विलांस” या “डिजिटल अरेस्ट” में होने का अहसास कराया गया और उसे सख्त हिदायत दी गई कि वह इस बारे में अपने परिवार, दोस्तों या किसी भी सरकारी एजेंसी से बात न करे। लगातार धमकियों और भय के कारण पीड़ित ने ठगों के कहने पर अलग-अलग बैंक खातों में बड़ी रकम ट्रांसफर कर दी, जिन्हें बाद में म्यूल अकाउंट यानी ठगी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले खाते पाया गया।

इस पूरे घटनाक्रम में पीड़ित को यह विश्वास दिलाया गया कि यह पैसा जांच के लिए सुरक्षित सरकारी खातों में जमा किया जा रहा है, जबकि वास्तव में यह रकम साइबर ठगों के जाल में चली गई और पीड़ित को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।

इस बीच, साइबर पुलिस ने इस मामले के सामने आने के बाद आम लोगों के लिए एक सार्वजनिक चेतावनी भी जारी की है। इसमें साफ कहा गया है कि सीबीआई, पुलिस, प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग या कोई भी कानून प्रवर्तन एजेंसी व्हाट्सऐप कॉल, वीडियो कॉल या फोन कॉल के जरिए न तो गिरफ्तारी करती है और न ही किसी तरह की जांच या पूछताछ। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि किसी भी सूरत में कोई सरकारी अधिकारी केस निपटाने, गिरफ्तारी रोकने या आरोप हटाने के नाम पर पैसे की मांग नहीं करता और भारतीय कानून में “डिजिटल अरेस्ट” जैसी कोई अवधारणा ही नहीं है। लोगों को आगाह किया गया है कि अगर किसी को अचानक फोन कर गंभीर अपराधों में फंसाने की धमकी दी जाए, तुरंत कार्रवाई का दबाव बनाया जाए, खाते फ्रीज करने या मीडिया में नाम उछालने की बात कही जाए, अकेले रहने और किसी से बात न करने को कहा जाए या तथाकथित सुरक्षित सरकारी खातों में पैसे भेजने को कहा जाए तो यह साफ तौर पर साइबर ठगी का संकेत है। कई मामलों में ठग फर्जी पहचान पत्र, नकली सरकारी पत्र या वर्दी और सरकारी लोगो के साथ वीडियो कॉल का सहारा भी लेते हैं ताकि सामने वाले को पूरी तरह यकीन दिलाया जा सके।

साइबर पुलिस का कहना है कि ऐसे मामलों में सबसे जरूरी है घबराना नहीं और जल्दबाजी में कोई फैसला न लेना। अगर किसी को इस तरह का कॉल आए तो तुरंत कॉल काटकर अपने नजदीकी पुलिस थाने या संबंधित विभाग के आधिकारिक हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क कर जानकारी की पुष्टि करनी चाहिए। किसी भी धमकी या दबाव में आकर पैसे ट्रांसफर नहीं करने चाहिए और न ही ओटीपी, बैंक विवरण, आधार, पैन या केवाईसी से जुड़ी जानकारी किसी को देनी चाहिए। इसके साथ ही परिवार के किसी भरोसेमंद सदस्य, दोस्त या कानूनी सलाहकार को तुरंत इसकी जानकारी देना जरूरी है, ताकि ठगों के बनाए डर के माहौल से बाहर निकला जा सके। अज्ञात ऐप डाउनलोड करने, स्क्रीन शेयर करने या फोन का रिमोट एक्सेस देने से भी बचने की सलाह दी गई है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा