अरब सागर के आसमान पर सोमनाथ मंदिर के हजार साल की अद्भुत गाथा, प्रधानमंत्री मोदी हुए मंत्रमुग्ध
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- Jan 11, 2026



सोमनाथ (गुजरात), 11 जनवरी (हि.स.)। सदियों से बार-बार हुए हमलों के बावजूद सोमनाथ मंदिर भारत की अटूट भावना के प्रतीक के रूप में आज भी शान से खड़ा है। इसी भावना का अद्भुत प्रकाश शनिवार देरशाम अरब सागर के ऊपर नभ पर देखने को मिला। करीब तीन हजार से भी अधिक ड्रोन के अनूठे संयोजन से सोमनाथ मंदिर के हजार साल की यात्रा को रोचक तरीके से प्रस्तुत किया गया। ड्रोन शो देखकर रोमांचित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से इस रोचक शो को कई तस्वीरें साझा की।
ड्रोन शो के जरिए अरब सागर के ऊपर आकाश में प्रकाश के अनूठे संयोजन के माध्यम से विभिन्न बिंदु चित्र- रंगीन आकृतियां सृजित की गईं। आकाश में उभरते प्रकाशमय दृश्य लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बन गए। ड्रोन के जरिए आकाश में बनी सोमनाथ मंदिर, त्रिशूल, ओम, वीर हमीरजी, अहिल्याबाई होल्कर, सरदार वल्लभभाई पटेल और नरेन्द्र मोदी की आकृतियां दिखाई गईं। हर बदलती हुई आकृति पर लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट और हर-हर महादेव के उद्घोष से मंदिर परिसर गुंजायमान रहा। उसके बाद रंग-बिरंगी आतिशबाजी ने लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अनोखे आयोजन से पवित्र सोमनाथ धाम में उत्सवमय और हर्षोल्लास का माहौल बन गया। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और राज्य के कई मंत्री उपस्थिति रहे।
उल्लेखनीय है कि सोमनाथ की गाथा केवल एक मंदिर की नहीं, बल्कि भारत माता के उन अनगिनत सपूतों के अदम्य साहस की कहानी है, जिन्होंने देश की संस्कृति और सभ्यता की रक्षा की। भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में भगवान सोमनाथ प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं। यह पावन भूमि, जिसे प्रभास क्षेत्र के नाम से जाना जाता है, केवल एक तीर्थस्थल नहीं बल्कि देश की अटूट श्रद्धा, संघर्ष और पुनरुत्थान का जीवंत प्रतीक है।
मध्यकाल में इस मंदिर ने कई आक्रमण झेले। ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद गजनी से लेकर अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब तक कई आक्रांताओं ने इसे लूटा और नष्ट किया। लेकिन हर बार राजा भीमदेव, सिद्धराज जयसिंह और कुमारपाल जैसे नायकों ने इसका पुनर्निर्माण कराया। अपनी आस्था की रक्षा के लिए हमीर जी गोहिल और वेगड़ा भील जैसे वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। जूनागढ़ की आजादी के बाद लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के दृढ़ संकल्प से आधुनिक सोमनाथ मंदिर का स्वप्न साकार हुआ। 11 मई 1951 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की। आधुनिक मंदिर की वास्तुकला (कैलाश महामेरू प्रसाद) वर्तमान सोमनाथ मंदिर नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे प्रसिद्ध वास्तुकार प्रभा शंकर सोमपुरा ने डिजाइन किया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / विजयालक्ष्मी



