फ़िल्म रिव्यू 'राहु केतु' : हंसी, कल्पना और भ्रष्टाचार पर तंज की मज़ेदार कहानी

फ़िल्म: 'राहु केतु'

कलाकार: पुलकित सम्राट, वरुण शर्मा, शालिनी पांडे, पीयूष मिश्रा, चंकी पांडे, अमित सियाल, मनु ऋषि चड्डा, सुमित गुलाटी

लेखक-निर्देशक: विपुल विज

निर्माता: उमेश कुमार बंसल, सूरज सिंह, वर्षा कुकरेजा, प्रगति देशमुख

रेटिंग: 4/5

लोककथाओं और किस्सों की कल्पनात्मक दुनिया जब आज के सिस्टम से टकराती है, तो जो हालात पैदा होते हैं, वही 'राहु केतु' की बुनियाद हैं। 16 जनवरी को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई यह फिल्म एक बार फिर पुलकित सम्राट और वरुण शर्मा की जानी-पहचानी जोड़ी को हल्की-फुल्की, लेकिन व्यंग्य से भरपूर कहानी में पेश करती है। निर्देशन की कमान विपुल विज ने संभाली है।

कहानी

फिल्म की शुरुआत पीयूष मिश्रा की विशिष्ट आवाज़ में सुनाए गए टाइटल सॉन्ग से होती है, जिसे एनिमेशन और कठपुतली शैली में पेश किया गया है। यह प्रयोग दर्शक को बिना देर किए फिल्म की अनोखी दुनिया में खींच लेता है और आगे की कहानी के लिए उत्सुकता जगा देता है। कहानी हिमाचल के एक शांत गांव में पहुंचती है, जहां फूफा (पीयूष मिश्रा) अपने गधे के साथ लेखक चुरू लाल शर्मा (मनु ऋषि चड्ढा) के घर आते हैं। उनके पास एक रहस्यमयी जादुई किताब है, जिसके बारे में मान्यता है कि उसमें लिखा हर शब्द सच हो जाता है। चुरू लाल फूफा को बताता है कि यही किताब अब उसके लिए मुसीबत बन चुकी है। उसकी कल्पना से गढ़े गए दो किरदार राहु (वरुण शर्मा) और केतु (पुलकित सम्राट) अब कल्पना की सीमा तोड़कर असल दुनिया में मनाली की सड़कों पर घूम रहे हैं और अपनी 'मनहूस' छाया फैला रहे हैं।

फूफा चुरू लाल को कहानी लिखने का ऐसा तरीका सुझाते हैं, जिससे राहु-केतु की शक्तियों का इस्तेमाल भ्रष्ट और बेईमान लोगों के खिलाफ किया जा सके। यहीं से शुरू होता है इन दोनों का अनोखा तांडव, जहां किताब में लिखा हर शब्द हकीकत बनता चला जाता है। कहानी उस वक्त नया मोड़ लेती है, जब यह जादुई किताब चोरी हो जाती है और हालात पूरी तरह पलट जाते हैं। इसी उथल-पुथल से जन्म लेती है अफरातफरी, ड्रामा और भरपूर कॉमेडी।

अभिनय

पीयूष मिश्रा फूफा के किरदार में फिल्म की रीढ़ साबित होते हैं और हर सीन में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराते हैं। वरुण शर्मा और पुलकित सम्राट राहु-केतु के रूप में पूरी तरह फिट नजर आते हैं और फिल्म की कॉमिक एनर्जी को संभालते हैं। शालिनी पांडे 'मीनू टैक्सी' के किरदार में सहज और प्रभावी लगती हैं। चंकी पांडे मोरदेचाई के रूप में अलग अंदाज़ में मनोरंजन करते हैं, जबकि अमित सियाल (भ्रष्ट एसएचओ) और सुमित गुलाटी (कांस्टेबल) अपने-अपने किरदारों से कहानी को सपोर्ट करते हैं।

निर्देशन, संगीत और तकनीकी पक्ष

निर्देशक विपुल विज ने कहानी के टोन को संतुलित रखा है और कलाकारों से सटीक काम निकलवाया है। सिनेमैटोग्राफी हिमाचल की खूबसूरती को प्रभावी ढंग से कैद करती है। बैकग्राउंड स्कोर और तकनीकी पहलुओं पर भी ध्यान दिया गया है। फिल्म के गाने कहानी की गति को बनाए रखते हैं और सुनने में भी सुखद लगते हैं।

फाइनल टेक

'राहु केतु' घटनाओं की तेज़ रफ्तार के जरिए दर्शकों को अंत तक बांधे रखती है। यह फिल्म कल्पना, व्यंग्य और हल्की-फुल्की कॉमेडी का ऐसा मिश्रण पेश करती है, जो रोज़मर्रा के तनाव से कुछ देर की राहत देता है। अगर आप परिवार के साथ बैठकर बिना ज्यादा दिमाग लगाए हंसना चाहते हैं, तो 'राहु केतु' एक आरामदायक सिनेमाई विकल्प हो सकती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / लोकेश चंद्र दुबे