एसआईआर सुनवाई : टुटू बोस और उनके पूरे परिवार को नोटिस, फुटबॉल जगत में आक्रोश

कोलकाता, 13 जनवरी (हि. स.)। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की सुनवाई के दायरे में अब सांसद से लेकर पूर्व विधायक, नोबेल पुरस्कार विजेता और देश का प्रतिनिधित्व कर चुके खिलाड़ी तक आ गए हैं। इस सूची में अब बंगाल फुटबॉल के दिग्गज और मोहनबागान के पूर्व अध्यक्ष स्वप्नसाधन बोस उर्फ टुटू बोस तथा उनके बेटे सृंजय बोस का नाम भी शामिल हो गया है। इतना ही नहीं, बोस परिवार के सभी सदस्यों को एसआईआर की सुनवाई में बुलाया गया है। परिवार को 19 जनवरी को उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।

बंगाल फुटबॉल में टुटू बोस एक अध्याय माने जाते हैं। वे मोहनबागान क्लब के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं और राज्यसभा के पूर्व सांसद भी हैं। उनके पुत्र सृंजय बोस भी पूर्व सांसद हैं और वर्तमान में मोहनबागान क्लब के सचिव हैं। ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों को सुनवाई के लिए बुलाए जाने से कई लोग हैरान हैं।

इससे पहले चुनाव आयोग अमर्त्य सेन, आलोक मुखर्जी, तरुण डे, मेहताब हुसैन, मोहम्मद शमी और लक्ष्मीरतन शुक्ला जैसे बंगाल की कई जानी-मानी हस्तियों को भी सुनवाई के लिए नोटिस भेज चुका है। आयोग का दावा है कि जिन मामलों में सूचनात्मक असंगति या तार्किक विसंगति पाई गई है, उन सभी को नोटिस भेजा जाएगा। इसी संदर्भ में टुटू बोस का नाम सामने आया है।

इस मामले को लेकर सोमवार को रसमणि रोड पर भवानीपुर क्लब के सामने पूर्व फुटबॉल खिलाड़ियों ने विरोध प्रदर्शन किया। उनका आरोप था कि एसआईआर के नाम पर टुटू बोस को परेशान किया जा रहा है। प्रदर्शन में मानस भट्टाचार्य, आलोक मुखर्जी, कॉम्पटन दत्त जैसे पूर्व खिलाड़ियों के साथ-साथ कई युवा फुटबॉलर भी शामिल थे।

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि दो वर्षों का काम दो महीनों में निपटाने की कोशिश में चुनाव आयोग आम लोगों को परेशान कर रहा है। साथ ही यह भी सवाल उठाया गया कि जिन्होंने देश के लिए पसीना बहाया, उन्हें अब अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

इस पूरे मामले पर तृणमूल कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा और चुनाव आयोग पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि टुटू बोस गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं और व्हीलचेयर के बिना चल-फिर नहीं सकते। ऐसे में उनसे यह साबित कराने की कोशिश की जा रही है कि वे भारतीय नागरिक हैं, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

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हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय पाण्डेय