बहू-बेटियों के स्मार्टफोन बैन मामले में मानवाधिकार आयोग सख्त, जालोर कलेक्टर को नोटिस जारी
- Admin Admin
- Jan 05, 2026
जालोर, 05 जनवरी (हि.स.)। जिले में 15 गांवों की बहू-बेटियों के स्मार्टफोन उपयोग पर लगाए गए सामाजिक प्रतिबंध को लेकर अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने इस मामले में जालोर कलेक्टर प्रदीप गावंडे के नाम नोटिस जारी करते हुए 14 दिन के भीतर जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
मानवाधिकार आयोग ने नोटिस में साफ किया है कि यह प्रतिबंध केवल महिलाओं पर लागू किया गया, जो सीधे तौर पर लिंग आधारित भेदभाव को दर्शाता है। आयोग ने कहा कि पंचायतों या किसी भी सामाजिक समूह को महिलाओं के संचार साधनों या तकनीक के उपयोग को नियंत्रित करने का कोई अधिकार नहीं है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने मामले का संज्ञान लेते हुए जिला मजिस्ट्रेट, जालोर को निर्देश दिए हैं कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच कर दो सप्ताह के भीतर कार्रवाई विवरण रिपोर्ट आयोग को भेजी जाए।
कलेक्टर प्रदीप गावंडे ने बताया कि मानवाधिकार आयोग से नोटिस प्राप्त हुआ है। उन्होंने बताया कि संबंधित पंचायत और समाज के पंचों द्वारा यह फैसला पहले ही वापस लिया जा चुका है, इसके बावजूद पूरे मामले की जांच कर आयोग को जवाब भेजा जाएगा।
यह विवाद 21 दिसंबर को शुरू हुआ था, जब जालोर जिले की चौधरी समाज सुंधामाता पट्टी की गाजीपुर गांव में बैठक आयोजित हुई थी। 14 पट्टी के अध्यक्ष सुजनाराम चौधरी की अध्यक्षता में हुई बैठक में 15 गांवों की बहू-बेटियों के लिए 26 जनवरी से कैमरे वाले मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय किया गया था।
फैसले के तहत महिलाओं को सार्वजनिक समारोहों, सामाजिक आयोजनों और यहां तक कि पड़ोसियों के घर जाते समय भी स्मार्टफोन ले जाने पर रोक लगा दी गई थी। उन्हें केवल की-पैड मोबाइल फोन इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया था।
फैसले के सामने आते ही इसका व्यापक विरोध शुरू हो गया था। विरोध के बाद समाज अध्यक्ष सुजनाराम चौधरी ने सफाई देते हुए कहा था कि महिलाओं के पास मोबाइल होने से बच्चे अधिक उपयोग करते हैं, जिससे आंखों पर असर पड़ने की आशंका रहती है।
हालांकि विरोध बढ़ने पर यह निर्णय वापस ले लिया गया।
पश्चिम बंगाल नेशनल क्राइम इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (एनजीओ) के मनीष जैन ने दो जनवरी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखकर इस मामले की शिकायत की थी। पत्र में कहा गया कि महिलाओं पर इस तरह का प्रतिबंध उनके मौलिक और मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
आयोग ने अपने नोटिस में कहा है कि ऐसे कदम आगे चलकर लड़कियों की शिक्षा, अभिव्यक्ति और आवाजाही की स्वतंत्रता को भी सीमित कर सकते हैं। प्रथम दृष्टया यह मामला मानवाधिकार उल्लंघन का प्रतीत होता है। फिलहाल, मानवाधिकार आयोग के निर्देशों के बाद जिला प्रशासन द्वारा जांच की प्रक्रिया शुरू की जा रही है और इसकी रिपोर्ट दो सप्ताह में आयोग को भेजी जाएगी।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित



