लखनपुर में बोरी-बिस्तर लेकर कब्जा करो और सुविधा पाओ सरकारी क्वार्टरों पर कब्जे का खुला खेल

लखनपुर अनिल शर्मा । अगर किसी गरीब या जरूरतमंद के पास रहने के लिए मकान नहीं है तो शायद उसे अब सरकारी आवास मिलने के लिए किसी आवेदन, अनुमति या आधिकारिक आवंटन की जरूरत नहीं पड़ेगी। बस एक बोरी-बिस्तर उठाइए, किसी सरकारी क्वार्टर या खाली पड़ी सरकारी इमारत का दरवाजा खोलिए और आराम से रहने लग जाइए। कम से कम लखनपुर में सरकारी क्वार्टरों को लेकर सामने आ रहे सवाल तो कुछ ऐसा ही संदेश देते नजर आ रहे हैं।सबसे हैरानी की बात यह है कि इन सरकारी क्वार्टरों में कौन रह रहा है, किसके नाम पर रह रहा है और किस आदेश के तहत रह रहा है इसका स्पष्ट रिकॉर्ड संबंधित विभाग के पास ही उपलब्ध नहीं है।

 

सूचना के अधिकार के तहत जब यह पूछा गया कि क्या सरकारी क्वार्टरों में रहने वाले कब्जाधारकों का पुलिस सत्यापन कराया गया है और यदि हां, तो उसकी प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं, तो विभाग की ओर से जवाब आया कि कार्यालय में ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।अब सवाल यह है कि जब विभाग के पास रहने वालों का रिकॉर्ड ही नहीं है तो आखिर सरकारी क्वार्टरों के दरवाजे किसके लिए खुले है सरकारी संपत्ति किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती। किसी सरकारी क्वार्टर में किसी कर्मचारी, अधिकारी या अन्य व्यक्ति को रहने की अनुमति देने के लिए नियमानुसार आवंटन की प्रक्रिया होनी चाहिए। लेकिन लखनपुर के मामले में यदि विभाग के पास कब्जाधारकों के नाम, आवंटन संबंधी दस्तावेज और पुलिस सत्यापन का रिकॉर्ड तक उपलब्ध नहीं है, तो यह पूरी व्यवस्था अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करती है।क्या बिना किसी आधिकारिक आदेश के सरकारी क्वार्टरों में लोग रह रहे हैं अगर हां, तो उन्हें वहां रहने की अनुमति किसने दी क्या कभी यह जांच की गई कि सरकारी आवासों पर रहने वाले लोग वास्तव में पात्र हैं भी या नहीं और अगर किसी व्यक्ति को सरकारी क्वार्टर आवंटित ही नहीं हुआ तो वह वर्षों से वहां कैसे रह रहा है।

 

लखनपुर की स्थिति पर व्यंग्य करें तो शायद अब सरकारी मकान पाने का नया नियम कुछ ऐसा ही होना चाहिए मकान नहीं है तो बोरी-बिस्तर उठाइए, खाली सरकारी क्वार्टर ढूंढिए और कब्जा कर लीजिए। न कमेटी कुछ बोलेगी, न विभाग पूछेगा और न ही जिला प्रशासन को इसकी भनक लगेगी। अगर प्रशासन को भनक लग जाएगी तो  वह करवाई नहीं करेंगे।इतना ही नहीं, यदि सरकारी परिसर में रहने वाले लोगों को बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मिल रही हैं, तो मामला और गंभीर हो जाता है। आम नागरिक अपने घर का बिजली-पानी का बिल भरता है, लेकिन यदि सरकारी संपत्ति पर अनधिकृत रूप से रहने वाले लोगों को सरकारी संसाधनों का लाभ मिल रहा है तो इसका खर्च आखिर किसके खाते में जा रहा है क्या इन सुविधाओं के लिए कोई वैध कनेक्शन और उपभोक्ता रिकॉर्ड मौजूद है इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि संबंधित विभाग के अधिकारी और कर्मचारी उसी क्षेत्र में बैठते हैं, फिर भी सरकारी क्वार्टरों में कौन रह रहा है

 

, इसकी जानकारी कार्यालयी रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं होना कई सवाल खड़े करता है।यदि अधिकारी रोजाना इन परिसरों के आसपास काम करते हैं, तो वर्षों से वहां रह रहे लोगों की जानकारी विभाग तक क्यों नहीं पहुंची यदि जानकारी थी, तो रिकॉर्ड क्यों नहीं बनाया गया और यदि जानकारी नहीं थी तो सरकारी संपत्ति की निगरानी आखिर कौन कर रहा था सरकारी भवनों और क्वार्टरों की सुरक्षा एवं निगरानी की जिम्मेदारी किसी न किसी अधिकारी या विभाग की होती है। ऐसे में रिकॉर्ड का उपलब्ध न होना केवल एक कागजी कमी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि पूरे मामले में किसी अधिकारी या कर्मचारी की मिलीभगत है। लेकिन जिस तरह रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई है उससे मिलीभगत, संरक्षण या गंभीर विभागीय लापरवाही जैसे सवाल जरूर उठते हैं।अगर किसी व्यक्ति ने बिना आवंटन सरकारी क्वार्टर पर कब्जा किया है और विभाग ने वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं की, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।अब समय आ गया है कि लखनपुर के इस मामले को केवल विभागीय फाइलों तक सीमित न रखा जाए। जिला प्रशासन कठुआ को संबंधित विभागों के साथ मिलकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करवानी चाहिए।जांच के दौरान यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि सरकारी क्वार्टरों में वर्तमान में कौन-कौन लोग रह रहे हैं।उन्हें क्वार्टर किस आदेश या प्रक्रिया के तहत मिले।किन लोगों के नाम पर आधिकारिक आवंटन हुआ।क्या सभी निवासियों का पुलिस सत्यापन कराया गया।बिजली और पानी के कनेक्शन किसके नाम पर हैं।सरकारी संपत्ति पर कोई अनधिकृत कब्जा है तो वह कब से है।अब तक संबंधित विभाग ने ऐसे कब्जों के खिलाफ क्या कार्रवाई की।सरकारी संपत्ति की निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं।कमेटी, विभाग और पुलिस प्रशासन की भूमिका भी जांच के दायरे में आए