सबको अपना मानना ही समरसता का पहला कदम है : भागवत

रायपुर, 01 जनवरी (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा, भेदभाव और अलगाव की भावना को मन से निकालकर सबको अपना मानना ही समरसता का पहला कदम है। वे यहां समाजों के प्रमुखों और प्रतिनिधियों के साथ एक सामाजिक सद्भावना बैठक में बोल रहे थे।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के तीन दिवसीय प्रवास के अंतिम दिन गुरुवार को संघ प्रमुख भागवत विभिन्न महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में शामिल हुए।सुबह उन्होंने रायपुर के वीआईपी रोड स्थित श्रीराम मंदिर में पूजा-अर्चना की और आरती में सहभागी बने। इसके बाद उन्होंने मंदिर परिसर के सभागार में विभिन्न समाजों के प्रमुखों और प्रतिनिधियों के साथ एक सामाजिक सद्भावना बैठक की। इस दौरान संघ प्रमुख ने सामाजिक समरसता और एकजुटता पर बल दिया और विविध जाति, पंथ और समाजों के प्रतिनिधियों के साथ उन्होंने पंगत में भोजन किया।

रायपुर के वीआईपी रोड स्थित श्री राम मंदिर परिसर में आयोजित सद्भावना बैठक (सामाजिक सद्भाव बैठक) में सरसंघचालक भागवत ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि भेदभाव और अलगाव की भावना को मन से निकालकर सबको अपना मानना ही समरसता का पहला कदम है। उन्होंने कहा कि भारत में सर्वत्र लोग अपनी-अपनी आस्था और आचरण के साथ सद्भाव के कारण एक साथ रहते हैं। घर का काम करने वाले नौकर को भी उस घर के बच्चे चाचा कहते हैँ, उसे पूरा सम्मान देते हैँ, यह सद्भभाव देश में कई वर्षों से चला आ रहा है।

उन्होंने कहा कि ब्रिटिश लोग स्वेच्छा से भारत से नहीं गए हैँ। हमारे लोगों ने एकजुट होकर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। अपनी एकता और अखंडता के कुछ तंतुओं को हम भूल गए, इसलिए हमारी दृष्टि में भेद आ गया था। अंग्रेजों को हमारी एकता अच्छी नहीं लगी तो उन्होंने इसकी भी व्यवस्था कर दी और बाद में भी भारत में हमारे बीच में भेद रहे, लेकिन उनके प्रयासों को हमने समय-समय पर असफल किया।

उन्होंने कहा कि अपनी-अपनी विशिष्टता के साथ आगे बढ़ने की अपने यहाँ पूर्ण स्वतंत्रता है। दूसरे का भी सम्मान करें। जहाँ सद्भावना पक्की है वहां बिगाड़ने वालों की नहीं चलेगी। तोड़ने वाली शक्तियां असफल हों, इसके लिए हमें प्रयास करना है। कुछ न कुछ अपनी-अपनी चुनौतियाँ भी हैं । प्रत्येक समाज की आकांक्षाएं हैं। हम सब अपनी-अपनी विविधता को संभाल कर रखते आए हैं। किसी की अस्मिता समाप्त नहीं हुई। हम समाज और राष्ट्र के नाते एक हैँ, उसके पीछे सामाजिक सद्भाव है। भारत में आकर भी भारत की रीति में कुछ लोग नहीं रहते हैँ, इसलिए वह आक्रमण करते हैं। हम चिंतित हैं , हमें और चिंतित होना चाहिए।

संघ प्रमुख ने कहा कि लव जिहाद, मतांतरण, व्यसन आदि पर प्रबोधन(जागरण) करना होगा। अकेलेपन की भावना व्यसन की ओर धकेलती है।उन्होंने कहा कि लोगों को जाति, धन, भाषा या क्षेत्र के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए। व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी जाति, भाषा या संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से होना चाहिए। उन्होंने अनावश्यक और भेदभावपूर्ण रूढ़ियों को त्यागने और उन्हें आधुनिक मानकों पर परखने की आवश्यकता पर जोर दिया, जैसा कि स्वामी विवेकानंद और डॉ. आंबेडकर ने कहा था।

संघ प्रमुख ने सद्भावना बैठक में अपने जीवन में सामाजिक समरसता, पारिवारिक मूल्य (कुटुंब प्रबोधन), स्वदेशी अपनाना, नागरिक अनुशासन और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी उतारने की अपील की। उन्होंने घर में मातृभाषा का उपयोग करने, भारतीय वेशभूषा का सम्मान करने और 'वोकल फॉर लोकल' (स्थानीय उत्पादों के उपयोग) का आग्रह किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में बोली जाने वाली सभी भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं हैं।भागवत ने कहा कि मंदिर, जलाशय और श्मशान घाट जैसे सार्वजनिक स्थल सभी हिंदुओं के लिए समान रूप से उपलब्ध होने चाहिए।

उन्होंने कहा कि हमारे बीच के जो लोग दुर्बल या वंचित हैँ उनके सशक्तीकरण के लिए कुछ कर सकते हैं क्या? हर बैठक में तय करके आगे बढ़ना। हम समर्थ हैं तो हमारा सामर्थ्य उनके उपयोग में आना चाहिए। हमारा पूरा समाज एक है। जाति पंथ उसके अंग है, जिस प्रकार पूरा शरीर एक है, इसी तरह हमारी पृथक आस्था व आचरण होने के बाद भी हमारी अस्मिता एक हैं। हम सभी जाति, पंथ बिरादरी मिलकर जिस क्षेत्र में निवास करते हैं उसकी उन्नति के लिए क्या कर सकते हैं, इस पर साझा विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान में प्रस्तावना, मौलिक अधिकार, नागरिक कर्तव्य, नीति निर्देशक तत्व बताए गए हैँ, सबको इसकी जानकारी होनी चाहिए। देश के सभी नियम क़ानून का पालन करना चाहिए। कुछ बातें लिखित नहीं होती, लेकिन वह सामाजिक मूल्य हैं। बड़े बुजुर्गों का बच्चे सम्मान करें उससे विनम्रता आती है, यह सब करने से समाज में सद्भभावना बढ़ता है। उन्होंने कुटुंब प्रबोधन तथा सप्ताह में एक दिन मंगल संवाद करने पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और 'सनातन धर्म', 'हिंदुत्व' और 'भारत' एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। उन्होंने समाज के सभी वर्गों—विभिन्न जातियों, पंथों और बुद्धिजीवियों से राष्ट्र निर्माण में सहयोग करने की अपील की। धर्मांतरण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि समाज में भरोसे की कमी इसका एक बड़ा कारण है; यदि जमीनी स्तर पर आपसी जुड़ाव बढ़े, तो ऐसी समस्याओं का समाधान संभव है।

इस बैठक में विभिन्न जातियों और समाजों के लगभग 500 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।सामाजिक सद्भभाव बैठक की प्रस्तावना मध्यक्षेत्र के क्षेत्र संघचालक डॉ पूर्णेन्दु सक्सेना ने प्रस्तावना एवं प्रान्त संघचालक टोपलाल ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / केशव केदारनाथ शर्मा