नटरंग ने ‘स्वच्छ ग्राम’ का प्रभावशाली मंचन किया, संडे थिएटर के तहत स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का दिया सशक्त संदेश
- Neha Gupta
- Jan 04, 2026

जम्मू, 04 जनवरी । नटरंग ने अपनी साप्ताहिक रंगमंच श्रृंखला ‘संडे थिएटर’ के अंतर्गत रविवार को रानी पार्क, जम्मू में सामाजिक सरोकारों से जुड़े अपने नए नाटक ‘स्वच्छ ग्राम’ का मंचन किया। प्रख्यात रंगकर्मी नीरज कांत द्वारा लिखित एवं निर्देशित यह नाटक एक जीवंत स्ट्रीट परफॉर्मेंस के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसका उद्देश्य आम नागरिकों को स्वच्छता, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और लापरवाह कचरा निस्तारण के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करना रहा। हास्य, प्रतीकात्मकता और प्रभावशाली दृश्य संयोजन के माध्यम से नाटक ने स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण बनाए रखने के लिए नागरिक चेतना और सामूहिक भागीदारी की आवश्यकता को सशक्त रूप से सामने रखा। प्रस्तुति ने दर्शकों को रोजमर्रा की उन आदतों पर सोचने के लिए मजबूर किया, जो अनजाने में प्रदूषण और सार्वजनिक असुविधा का कारण बनती हैं।
नाटक की शुरुआत एक व्यस्त सड़क के दृश्य से होती है, जहां लोग बिना सोचे-समझे कचरा फेंकते नजर आते हैं। पप्पू नामक पात्र केला खाकर उसका छिलका सड़क पर फेंक देता है। एक बुजुर्ग उसे समझाने का प्रयास करता है कि सार्वजनिक स्थान सभी के होते हैं, लेकिन पप्पू उसकी बात को नजरअंदाज कर देता है। इसी दौरान मीना का प्रवेश होता है, जो केले के छिलके से फिसलते-फिसलते बचती है और नाराज होकर उसे डस्टबिन में डाल देती है। कथावाचक इस दृश्य के माध्यम से यह विडंबना उजागर करता है कि लोग डस्टबिन पास होने के बावजूद उनका उपयोग नहीं करते।
आगे के दृश्य में पप्पू फिर से लापरवाही दिखाते हुए गंदे डिस्पोजेबल बोतलें सड़क पर फेंक देता है। बुजुर्ग और मीना उसे बताते हैं कि इस तरह की अस्वच्छता कैसे गंदगी और बीमारियों को जन्म देती है। पास में मौजूद एक बच्चे की खांसी इस समस्या की गंभीरता को और गहराई से दर्शाती है। मीना इस बात पर जोर देती है कि जागरूकता और जिम्मेदारी से व्यवहार में बदलाव संभव है, जिससे पप्पू आत्ममंथन करने लगता है। कुछ दिनों बाद पप्पू के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव दिखाई देता है। जब उसे डस्टबिन नहीं मिलता, तो वह कचरा सड़क पर फेंकने के बजाय अपने बैग में रख लेता है। उसके इस बदलाव की बुजुर्ग और मीना सराहना करते हैं। पप्पू भविष्य में कभी कचरा न फैलाने और दूसरों को भी ऐसा करने से रोकने की शपथ लेता है। सभी पात्र मिलकर स्वच्छ भारत के लिए अपने आसपास को साफ रखने का संकल्प लेते हैं।
नाटक का अगला हिस्सा एक ऐसे इलाके में पहुंचता है जो प्लास्टिक कचरे से त्रस्त है। मोहन द्वारा सड़क पर प्लास्टिक बोतल फेंकते ही धरती मां का नाटकीय प्रवेश होता है, जो मानव गतिविधियों से हुए नुकसान के कारण व्यथित दिखाई देती हैं। इसके बाद प्लास्टिक मॉन्स्टर का प्रवेश होता है, जो यह दावा करता है कि इंसान ही उसे बनाते हैं और फिर उसके दुष्परिणाम भुगतते हैं, क्योंकि प्लास्टिक नष्ट नहीं होता। इसी क्रम में सुमन कपड़े का थैला और पुनः उपयोग योग्य बोतल लेकर प्रवेश करता है और मोहन को प्लास्टिक के उपयोग को कम करने तथा टिकाऊ विकल्प अपनाने का महत्व समझाता है। वह यह भी दर्शाता है कि प्लास्टिक बोतलों और डिब्बों का रचनात्मक पुनः उपयोग कैसे किया जा सकता है और कचरे को कबाड़ी को देकर रिसाइक्लिंग में कैसे बदला जा सकता है। जैसे-जैसे पात्रों में जागरूकता बढ़ती है, प्लास्टिक मॉन्स्टर की शक्ति कमजोर पड़ने लगती है।
नाटक का समापन सभी पात्रों द्वारा रिड्यूस, रीयूज और रिसाइकिल’ के सिद्धांतों को अपनाने की सामूहिक शपथ के साथ होता है। दर्शकों को कचरे के पृथक्करण, सूखे कचरे को नीले और गीले कचरे को हरे डस्टबिन में डालने, रसोई कचरे से खाद बनाने और घर, गली व देश को स्वच्छ रखने में सक्रिय योगदान देने का संदेश दिया गया। प्रस्तुति इस सशक्त विचार के साथ समाप्त होती है कि एक सचमुच स्वच्छ भारत हर नागरिक की प्रतिबद्ध भागीदारी से ही संभव है।



