आज की शिक्षा पद्धति में हम चरक, धन्वंतरि जैसे विद्वानों को भूल गए हैं : हरेकृष्ण शतपथी

नई दिल्ली, 15 जनवरी (हि.स.)। विश्व पुस्तक मेला में साहित्य अकादेमी ने गुरुवार को 'लेखक मंच’ में ‘आमने-सामने’ कार्यक्रम और ‘भारत की बौद्धिक परंपराएं’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की। संस्कृत व्याकरण के विद्वान हरेकृष्ण शतपथी ने कहा कि आज की शिक्षा पद्धति में हम चरक, धन्वंतरि जैसे विद्वानों को भूल गए हैं।

‘आमने-सामने’ कार्यक्रम में साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत मलयाळम् लेखक के.पी. रामानुण्णी ने श्रोताओं के समक्ष अपनी रचना प्रक्रिया साझा की और अपनी रचनाओं का पाठ भी किया। भारत की बौद्धिक परंपराएं पर परिचर्चा कार्यक्रम में पंजाबी के प्रख्यात लेखक और अकादेमी के पंजाबी परामर्श मंडल के संयोजक रवेल सिंह, हरेकृष्ण शतपथी और कन्नड के प्रख्यात लेखक बसवराज कलगुडी ने सहभागिता की।

‘आमने-सामने’ कार्यक्रम में के.पी. रामानुण्णी ने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में कहा कि मैं भारत के इकलौते साहित्य के यूनेस्को शहर कोझिकोड से आया हूं। उन्होंने ‘एम टी पी‘ कहानी अंग्रेजी में प्रस्तुत की। यह ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी‘ का संक्षिप्त नाम है। उन्होंने बताया कि स्कूली जीवन में मैं लेखक नहीं वैज्ञानिक बनना चाहता था, परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि मैं लेखक बन गया।

'भारत की बौद्धिक परंपराएं (परिचर्चा)‘ में पंजाब की बौद्धिक परंपराओं पर बात करते हुए प्रख्यात पंजाबी लेखक रवेल सिंह ने कहा कि सिखिज्म और सूफिज्म पंजाब की सबसे बड़ी ज्ञान परंपरा है। ऋग्वेद भी हरियाणा- पंजाब की धरती पर ही लिखा गया। पाणिनि का व्याकरण, गीता, वाल्मीकि रामायण भी पंजाब की धरती पर ही लिखी गई। उन्होंने नाथ - जोगी परंपरा, मोहन जोदड़ो, हड़प्पा संस्कृति पर भी बात की। उन्होंने यह भी बताया कि तक्षशिला में ही अंतर्विषयक ज्ञान परंपरा की शुरुआत हुई, जो पंजाब की धरती पर है।

प्रख्यात संस्कृत विद्वान हरेकृष्ण शतपथी ने कहा कि हमारा अपना बौद्धिक और संस्कृतिक इतिहास है। भारत एक विश्व गुरु है। प्राचीन काल से ही भारत के पास नालंदा, तक्षशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय थे, जहां देश-विदेश से विद्यार्थी पढ़ने आते थे। उन्होंने कहा कि आज की शिक्षा पद्धति में हम चरक, धन्वंतरि जैसे विद्वानों को भूल गए हैं। वेद का अर्थ है ज्ञान और इसे लिखने वाले भारतीय हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हमारे पहले गुरु हैं।

कन्नड के प्रख्यात लेखक बसवराज कलगुडी दक्षिण भारत के बौद्धिक परंपरा के बारे में बताते हुए कहा कि हमारी ज्ञान परंपरा हजारों साल पुरानी है। पहले मौखिक फिर लिखित रूप में आई। आगे उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में विभिन्न समुदायों की एक जटिल प्रणाली है, जिसमें विद्वान अपनी बुद्धि या रचनात्मकता के चित्रण के लिए नैतिकता का उपयोग करते हैं। इस तरह की अनेक पुस्तकें कई शताब्दियों से हमारी लिखित संस्कृति में रही हैं। उन्होंने आदिवासी और कृषक समाज की बौद्धिक परंपराओं की भी चर्चा की l

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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी