डॉक्टर या कसाई डॉक्टर के हाथ में चाकू हो तो वह जिंदगी बचाने के लिए होना चाहिए मरीज की जेब काटने के लिए नहीं

मोहित जम्वाल कठुआ : डॉक्टर को हमारे समाज में भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है। वजह भी साफ है—जब इंसान जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा होता है, तब वह अपनी सबसे कीमती चीज, अपनी जिंदगी, डॉक्टर के भरोसे छोड़ देता है। लेकिन यही भरोसा जब कुछ लोगों के लिए कमाई का अवसर बन जाए, तब सवाल उठना लाजिमी है—यह इलाज है या कारोबार?
 
 
कसाई और डॉक्टर—दोनों के हाथ में काटने का औजार हो सकता है, लेकिन दोनों के उद्देश्य में जमीन-आसमान का फर्क होना चाहिए। कसाई का काम काटना है, डॉक्टर का धर्म बचाना। डॉक्टर का चाकू शरीर पर चले तो उसके पीछे जीवन बचाने की जरूरत होनी चाहिए, मुनाफा बढ़ाने की नहीं। लेकिन जब मरीज की बीमारी से पहले उसकी जेब देखी जाने लगे, जरूरत से ज्यादा महंगे टेस्ट लिखे जाएँ, अनावश्यक प्रक्रियाओं का बोझ डाला जाए और डरे-सहमे परिवार की मजबूरी को बढ़ते बिल में बदल दिया जाए—तो सवाल सिर्फ डॉक्टर पर नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर उठता है जिसने सेवा को सौदा और मरीज को ग्राहक बना दिया।
 
 
यह भी उतना ही सच है कि हर डॉक्टर को कठघरे में खड़ा करना गलत होगा। आज भी असंख्य डॉक्टर दिन-रात मरीजों की जिंदगी बचा रहे हैं और अपने पेशे की गरिमा को कायम रखे हुए हैं। सवाल उन डॉक्टरों और संस्थानों से है, जिनके लिए मरीज की नब्ज से ज्यादा उसके बैंक बैलेंस की अहमियत हो गई है।
 
 
याद रखना चाहिए—अस्पताल में आने वाला इंसान ग्राहक नहीं होता। वह दर्द लेकर आता है, डर लेकर आता है और सबसे बढ़कर उम्मीद लेकर आता है। उसकी मजबूरी को कमाई का मौका बनाना चिकित्सा के मूल उद्देश्य के खिलाफ है। चिकित्सा व्यवसाय हो सकती है, लेकिन मरीज की मजबूरी व्यापार नहीं हो सकती।
 
 
जिस दिन इलाज में इंसानियत से ज्यादा मुनाफा महत्वपूर्ण हो जाए, उसी दिन डॉक्टर और कसाई के बीच खींची गई नैतिक रेखा धुंधली होने लगती है। डॉक्टर का चाकू जिंदगी बचाए—जेब नहीं काटे।