जालंधर के उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने विकास योजना इंदिरापुरम में फ्लैट देने में नाकाम रहने पर जालंधर नगर सुधार ट्रस्ट के खिलाफ फैसला सुनाया है। आयोग की बेंच ने ट्रस्ट को आदेश दिया है कि वह उपभोक्ता द्वारा जमा की गई 4,43,669 रुपये की पूरी राशि 9% वार्षिक ब्याज के साथ वापस करे। इसके साथ ही उपभोक्ता को हुई मानसिक परेशानी के लिए 30,000 रुपये मुआवजा और 10,000 रुपये अदालती खर्च दे। यह फैसला स्व. सतीश कुमार के कानूनी वारिस तरविंदर कुमार सोई की शिकायत पर आया है। कॉलोनी के उपभोक्ताओं को केस लड़ने में बीबी भानी फ्लैट कांप्लेक्स एसोसिएशन मदद दे रही है। इस संगठन के प्रधान दर्शन सिंह ने कहा कि जालंधर नगर सुधार ट्रस्ट 300 केस हार चुका है। इन केसों में लोगों को पैसे लौटने की 86 करोड़ की देनदारी बनी है। जनता अपनी कमाई ट्रस्ट के खाते में जमा करके अब पैसा वापस लेने को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रही है। लापरवाही पर भारी जुर्माना लगा : यदि ट्रस्ट इस आदेश को 45 दिनों के भीतर लागू नहीं करता है, तो उसे जमा राशि पर 3% अतिरिक्त वार्षिक ब्याज (कुल 12%) देना होगा, जिससे ट्रस्ट पर वित्तीय बोझ और बढ़ जाएगा। दस्तावेजों की अनिवार्यता तय : आयोग ने साफ कर दिया कि पंजाब अपार्टमेंट एंड प्रॉपर्टी रेगुलेशन एक्ट (पापरा) के तहत कंप्लीशन सर्टिफिकेट और बुनियादी सुविधाएं दिए बिना कब्जे की पेशकश को वैध नहीं माना जा सकता। इससे ट्रस्ट अब बिना तैयारी के अधूरे फ्लैटों का कब्जा लेने के लिए आवंटियों पर दबाव नहीं बना पाएगा। आयोग ने स्पष्ट किया कि जब तक जालंधर नगर सुधार ट्रस्ट कंप्लीशन सर्टीफिकेट पेश नहीं करता, तब तक उपभोक्ता का हक बना रहता है और मामला समय सीमा से बाहर नहीं होता। चूंकि ट्रस्ट का यह प्रोजेक्ट रेरा में पंजीकृत नहीं था, इसलिए उपभोक्ता अदालत में इस मामले की सुनवाई को पूरी तरह सही ठहराया गया है, जिससे अन्य पीड़ित खरीदारों के लिए भी राहत का रास्ता साफ हो गया है। उपभोक्ता के वकील के अनुसार, साल 2006 में एक ड्रा के जरिए उन्हें पहली मंजिल पर एलआईजी फ्लैट नंबर 15 आवंटित किया गया था, जिसके लिए किस्तों में कुल 4,43,669 रुपये जमा किए गए। आवंटन पत्र की शर्तों के मुताबिक, ट्रस्ट को ढाई साल के भीतर यानी मार्च 2009 तक सभी जरूरी सुविधाओं के साथ फ्लैट का कब्जा सौंपना था, लेकिन करीब 13 साल से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी ट्रस्ट कब्जा देने में पूरी तरह नाकाम रहा। उपभोक्ता का आरोप है कि वहां न तो बिजली की सप्लाई थी और न ही आने-जाने के लिए 45 फीट चौड़ी सड़क बनाई गई थी। ट्रस्ट ने झूठे विज्ञापन देकर और जरूरी बुनियादी सुविधाएं विकसित किए बिना उन्हें गुमराह किया और धोखा दिया, जिससे परेशान होकर उन्होंने अपनी रकम ब्याज सहित वापस मांगी। नगर सुधार ट्रस्ट की दलीलें जालंधर नगर सुधार ट्रस्ट के वकील ने इन आरोपों को खारिज करते हुए तकनीकी आपत्तियां उठाईं। ट्रस्ट का कहना था कि यह शिकायत कानून के दायरे में विचार करने योग्य नहीं है और इसमें सही तरीके से अदालती फीस भी नहीं चुकाई गई है। ट्रस्ट ने दावा किया कि फ्लैट का निर्माण पूरी तरह मुकम्मल था और मूल आवंटी को साल 2009 में ही कब्जा दे दिया गया था, इसलिए करीब 14 साल बाद दायर की गई यह शिकायत समय सीमा के नियम के तहत खारिज होनी चाहिए। इसके अलावा ट्रस्ट ने यह दलील भी दी कि रियल एस्टेट विनियमन और विकास अधिनियम (रेरा) लागू होने के कारण इस मामले की सुनवाई उपभोक्ता अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती और शिकायतकर्ता को रेरा प्राधिकरण के पास जाना चाहिए ।

