लुधियाना में सरदार गुरदीप सिंह भैणी का अंतिम संस्कार:बेटों ने दी चिता को मुखाग्नि, 12 जनवरी को हुआ था निधन, लंबी बीमारी से जूझ रहे थे
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- Jan 16, 2026
लुधियाना जिले के वरिष्ठ नेता और दो बार के विधायक सरदार गुरदीप सिंह भैणी का अंतिम संस्कार शुक्रवार को उनके पैतृक गांव भैणी में किया गया। दोपहर 1 बजे अंतिम अरदास के बाद उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। वे 92 वर्ष के थे। उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। उनके दोनों बेटों ने अर्थी को कंधा दिया और श्मशान घाट में चिता को आग दी। 12 जनवरी को हुआ था निधन बता दे कि पूर्व विधायक सरदार गुरदीप सिंह भैणी का निधन लोहड़ी से एक दिन पहले, 12 जनवरी की सुबह उनके निवास पर हुआ था। परिवार के कुछ सदस्यों के विदेश में होने के कारण अंतिम संस्कार शुक्रवार को संपन्न किया गया।अंतिम संस्कार में राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक क्षेत्रों से जुड़े कई गणमान्य लोगों ने दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रमुख नेता और जनप्रतिनिधि रहे मौजूद इस अवसर पर कांग्रेस के पंजाब प्रधान और लुधियाना सांसद अमरिंदर सिंह राजा वडिंग, कांग्रेस जिला प्रधान मेजर सिंह, मंडी बोर्ड के पूर्व चेयरमैन सतिंदरपाल सिंह काका गरेवाल, पार्षद रविंदरपाल सिंह राजू कामरेड, सुखविंदर सिंह अमरीक सिंह, मनजीत हबड़ा और पूर्व विधायक मनप्रीत सिंह अयाली सहित कई प्रमुख नेता और जनप्रतिनिधि मौजूद थे। जनप्रिय नेता का अंत बता दे कि सरदार गुरदीप सिंह भैणी के निधन से लुधियाना जिले सहित पूरे राजनीतिक जगत में दुख व्यक्त किया गया है। उनके जाने से राजनीति ने एक अनुभवी, सादगीपूर्ण और जनप्रिय नेता को खो दिया।सरदार गुरदीप सिंह भैणी उन नेताओं में से थे जिन्होंने राजनीति को सत्ता का साधन नहीं, बल्कि जनता की सेवा का माध्यम माना। संघर्षों से भरी रही राजनीतिक यात्रा भैणी का सादगीपूर्ण जीवन, स्पष्ट विचारधारा और आम आदमी से सीधा जुड़ाव उनकी पहचान थी। विधायक के रूप में उन्होंने क्षेत्र के विकास, किसानों, मजदूरों और जरूरतमंद वर्ग की आवाज को हमेशा मजबूती से उठाया।उनकी राजनीतिक यात्रा ईमानदारी और संघर्षों से भरी रही। वे जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं को समझते और उनके समाधान के लिए तत्पर रहते थे। यही कारण है कि लोग उन्हें आज भी आदर और सम्मान के साथ याद करते हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा सरदार गुरदीप सिंह भैणी भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनकी ईमानदार राजनीति, जनसेवा की सोच और सादगीपूर्ण जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा। उनका जीवन एक ऐसी विरासत छोड़ गया है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। संघर्ष से राजनीति के शिखर तक का सफर सरदार गुरदीप सिंह भैणी का जन्म वर्ष 1934 में पिता हरनाम सिंह तूर एवं माता बचन कौर के घर हुआ। बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान से भारत आकर सिधवां बेट क्षेत्र के समीप गांव भैणी अरायां में आकर बसा। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने मेहनत, ईमानदारी और संघर्ष के बल पर समाज में अलग पहचान बनाई। प्रारंभिक जीवन में वे खेती-बाड़ी से जुड़े रहे भैणी प्रारंभिक जीवन में वे खेती-बाड़ी से जुड़े रहे बाद में पटवारी के रूप में सरकारी सेवा में आए। सादगीपूर्ण जीवनशैली के लिए पहचाने जाने वाले सरदार भैणी अक्सर साइकिल पर भैणी साहिब जाया करते थे, जो उनकी मजबूत इच्छाशक्ति और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व का प्रतीक रहा। 1985 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा राजनीतिक जीवन राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने 1985 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा। वे पहले शिरोमणि अकाली दल से विधायक बने। सुरजीत सिंह बरनाला की सरकार के दौरान उन्हें TUV कॉर्पोरेशन का चेयरमैन नियुक्त किया गया। अकाली दल और कांग्रेस दोनों में रहे उनके राजनीतिक जीवन का अहम मोड़ 2007 में आया, जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी भाग सिंह मल्ला को हराकर जीत दर्ज की। वे अकाली दल और कांग्रेस दोनों ही दलों में रहते हुए क्षेत्र की आवाज मजबूती से उठाने के लिए जाने जाते रहे। जनाधार और विरासत सरदार गुरदीप सिंह भैणी जगराओं और दाखा विधानसभा क्षेत्रों में मजबूत जनाधार रखने वाले नेता थे। उनके परिवार का गांव में सरपंच पद पर सबसे लंबा कार्यकाल रहा, जो जनता के भरोसे और उनके प्रभाव को दर्शाता है।उनके परिवार में दो बेटे हैं इनमें मेजर सिंह भैणी, जो कांग्रेस पार्टी से सक्रिय राजनीति में हैं और दाखा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं। जबकि सुखदेव सिंह तूर, जो कनाडा में प्रतिष्ठित व्यवसायी हैं।



