काम का दबाव, प्रतिस्पर्धा-पारिवारिक अपेक्षाएं बढ़ा रहीं परेशानी

गुस्से पर नियंत्रण न रहना और बढ़ता ईगो युवाओं से लेकर वयस्कों तक के लिए मानसिक चिंता का कारण बनता जा रहा है। छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन, खुद को हर हाल में सही साबित करने की जिद और रिश्तों में लगातार टकराव अब सामान्य व्यवहार का हिस्सा बनते दिख रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि काम का बढ़ता दबाव, प्रतिस्पर्धा, पारिवारिक अपेक्षाएं और भावनात्मक संवाद की कमी इसकी बड़ी वजह है। स्थिति यह है कि हर महीने शहर के मनोचिकित्सकों के पास ऐसे कई केस पहुंच रहे हैं, जिनमें एंग्जायटी, नींद न आना, बेचैनी, गुस्सा और रिश्तों में दूरी जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि गुस्सा और ईगो जब लंबे समय तक बने रहते हैं, तो यह व्यक्ति के सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित करने लगते हैं। धीरे-धीरे यह व्यवहार मानसिक थकान, अकेलापन और डिप्रेशन की ओर ले जाता है। ऐसे में समय पर संकेतों को समझना और मदद लेना बेहद जरूरी है। गुस्सा-ईगो कंट्रोल मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी गुस्सा और ईगो दोनों ही ऐसे भाव हैं, जो समय पर कंट्रोल न हों तो मानसिक संतुलन और रिश्तों पर नकारात्मक असर डालते हैं। गुस्सा अक्सर मानसिक तनाव, थकान और भावनाओं को दबाने का परिणाम होता है। ऐसे में जब भी गुस्सा आए, तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ क्षण रुककर गहरी सांस लेना, 10 तक उल्टी गिनती करना और उस जगह से थोड़ी देर के लिए हट जाना बेहद फायदेमंद होता है। नियमित ध्यान, योग और व्यायाम मन को शांत रखते हैं और नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालने में मदद करते हैं। शांत संगीत सुनना और किसी भरोसेमंद व्यक्ति से खुलकर बात करना भी गुस्से को कम करने में सहायक है। इसके साथ ही पूरी नींद लेना बेहद जरूरी है, क्योंकि नींद की कमी चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ा देती है। ईगो व्यक्ति को भीतर से कठोर बना देता है और सामाजिक व पारिवारिक रिश्तों में दूरी पैदा करता है। दूसरों की अच्छाइयों को पहचानना, अपनी गलतियों को स्वीकार करना और अलग-अलग विचारों को समझने की कोशिश करना ईगो को कम करता है। डॉ. अंशुल महाजन, मनोचिकित्सक केस 1 :ऑफिस में टकराव बढ़ा, काम प्रभावित हुआ : निजी कंपनी में काम करने वाले युवा कर्मचारी को छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आने लगा। मीटिंग्स में असहमति होते ही वह आक्रामक हो जाता था। ईगो के कारण उसकी परफॉर्मेंस और टीमवर्क पर असर पड़ा। घर में भी चिड़चिड़ापन बढ़ गया। काउंसिलिंग में यह सामने आया कि दबा हुआ तनाव और खुद को श्रेष्ठ साबित करने की सोच उसकी समस्या की जड़ थी। केस 2 :घर में हर बात बनी बहस की वजह : एक विवाहित महिला घरेलू जिम्मेदारियों और नौकरी के दबाव से जूझ रही थी। किसी भी सुझाव को वह अपने आत्मसम्मान पर चोट मानने लगी। बात-बात पर गुस्सा और बहस होने लगी, जिससे पारिवारिक माहौल बिगड़ गया। लंबे समय तक चले तनाव ने उसे एंग्जायटी की स्थिति में पहुंचा दिया। केस 3 :पढ़ाई का दबाव बना गुस्से की वजह : कॉलेज छात्र बेहतर परिणाम न मिलने पर खुद पर और दूसरों पर गुस्सा निकालने लगा। दोस्तों से दूरी बढ़ी और अकेलेपन की भावना हावी हो गई। ईगो के कारण वह मदद लेने से बचता रहा। जब मानसिक दबाव बढ़ा, तब काउंसिलिंग से उसे धीरे-धीरे संतुलन मिला।