चंडीगढ़ कोर्ट में पालतू बिल्लियों से क्रूरता नहीं हुई साबित:सबूतों के अभाव में आरोपी को बरी, आरोप-दो पालतू बिल्लियों को दुकान में बांधकर रखा

चंडीगढ़ जिला अदालत ने पालतू बिल्लियों से क्रूरता के एक मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी विनोद कुमार को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने जानबूझकर बिल्लियों के साथ क्रूरता की।यह मामला सोसाइटी फॉर प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स ने दर्ज कराया था। आरोप था कि 27 जून 2023 को सेक्टर-21डी के आज़ाद मार्केट में बूथ नंबर 351 और 337 के पास आरोपी ने दो पालतू बिल्लियों को दुकान के शटर से बांधकर रखा। बताया गया कि बिल्लियों को ठीक से हिलने-डुलने नहीं दिया गया और उन्हें खाने, पानी और सही देखभाल भी नहीं मिली। मामले में फील्ड इंस्पेक्टर की ओर से धारा 11 पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के तहत शिकायत दर्ज की गई थी। कोर्ट में शिकायतकर्ता पक्ष ने तीन गवाह पेश किए और कुछ फोटो भी रिकॉर्ड पर रखे। वहीं आरोपी ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए खुद को झूठा फंसाए जाने की बात कही। सबूत न पेश करने पर किया बरी कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह साबित नहीं हो सका कि जिन बिल्लियों के साथ क्रूरता का आरोप लगाया गया, वे वास्तव में आरोपी की ही थीं। अदालत ने यह भी माना कि रिकॉर्ड पर रखी गई तस्वीरों की मूल कॉपी पेश नहीं की गई और न ही भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत जरूरी प्रमाण पत्र लगाया गया। कोर्ट ने कहा कि तस्वीरों में न तो दुकान का नाम साफ दिखाई देता है और न ही उनमें तारीख और समय दर्ज है, जिससे घटना की पुष्टि हो सके। इसके अलावा, फील्ड इंस्पेक्टर और एक अन्य गवाह ने भी यह स्वीकार किया कि उन्होंने खुद बिल्लियों को शटर से बंधा हुआ नहीं देखा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह साबित नहीं किया जा सका कि बिल्लियों को लंबे समय तक या भारी जंजीर से बांधकर रखा गया था। नहीं ठहराया जा सकता दोषी इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा है। ऐसे में आरोपी को धारा 11 पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने आरोपी को बरी करते हुए उसकी जमानत रद्द की और केस प्रॉपर्टी को नियमों के अनुसार निपटाने के आदेश दिए।