वेद मन्दिर योल में 78 दिवसीय यज्ञानुष्ठान-60वें दिन ब्रह्मज्ञान और जीवन संतुलन पर प्रवचन

78-Day Yajna Ritual at Ved Mandir, Yol – Discourse on Brahma-Gyan and Life Balance on the 60th Day


कठुआ, 10 जून । वेद मन्दिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 60वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने श्रद्धालुओं को अथर्ववेद के 11वें काण्ड, सूक्त 3 के गूढ़ अर्थों से अवगत कराया।

उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि वेदों का मूल उद्देश्य ईश्वर प्राप्ति है। साधक वेदों में वर्णित ज्ञान (ब्रह्मोदनम्) को प्राप्त कर नित्य यज्ञ, अग्निहोत्र और योगाभ्यास के माध्यम से ब्रह्म की प्राप्ति कर सकता है। उन्होंने ब्रह्मोदनम् को “वेद ज्ञान का भोजन” बताते हुए कहा कि यह आत्मा के पोषण के लिए आवश्यक है। स्वामी जी ने पञ्चौदनम् (भौतिक भोजन) और ब्रह्मोदनम् (आध्यात्मिक ज्ञान) के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि जैसे शरीर को जीवित रखने के लिए भोजन आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मा के उत्थान के लिए वेद ज्ञान अनिवार्य है। उन्होंने बताया कि वेदों में ज्ञानियों के बीच यह प्रश्न उठाया कि मनुष्य केवल भौतिक पदार्थों तक सीमित है या उसने ब्रह्म ज्ञान को भी आत्मसात किया है।

प्रवचन में यह भी कहा गया कि मनुष्य को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति पर समान ध्यान देना चाहिए। केवल भौतिक जीवन में उलझे रहने से जीवन का उद्देश्य अधूरा रह जाता है जबकि आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में व्यक्ति पथभ्रष्ट हो सकता है। अंत में स्वामी राम स्वरूप जी ने कहा कि मनुष्य जीवन का सार तभी पूर्ण होता है जब वह भौतिक आवश्यकताओं के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान को भी अपनाता है। इसी संतुलन से समाज में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

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