सूरत की कपड़ा फैक्टरी से 91 बाल मजदूर मुक्त, सात वर्ष तक के बच्चे भी शामिल

सूरत में बल मजदूर को मुक्त करवाया गया

सूरत, 13 मई (हि.स.)। सूरत में बाल मजदूरी और मानव तस्करी के खिलाफ प्रशासन, पुलिस और सामाजिक संगठनों की संयुक्त कार्रवाई में बड़ी सफलता मिली। शहर की एक कपड़ा फैक्टरी में छापा मारकर 91 बाल मजदूरों को मुक्त कराया गया, जिनमें सबसे छोटा बच्चा मात्र 7 साल का है। बच्चों से बेहद कम पैसों में लंबे समय तक काम कराया जा रहा था। कार्रवाई की भनक लगते ही फैक्टरी संचालक और ट्रैफिकिंग से जुड़े आरोपित मौके से फरार हो गए।

मुक्त कराए गए बच्चों में अधिकांश राजस्थान के जनजातीय क्षेत्रों से लाए गए थे जबकि कुछ बच्चे उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार के बताए जा रहे हैं। सभी बच्चों को बाल कल्याण समिति (सीडब्यूसी) के समक्ष पेश किया गया है। मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

यह कार्रवाई गायत्री सेवा संस्थान (जीसीसी) की सूचना और निगरानी के आधार पर की गई। संस्था पिछले करीब एक महीने से फैक्टरी पर नजर रखे हुए थी। बच्चों की मौजूदगी की पुष्टि होने के बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर), एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट, राजस्थान पुलिस, सूरत पुलिस और सामाजिक संगठन एसोसिएशन फॉर वालंटरी एक्शन (एविए) के साथ संयुक्त छापा मारा गया।

गायत्री सेवा संस्थान के निदेशक डॉ. शैलेंद्र पंड्या ने बताया कि बच्चों की निशानदेही पर टीम एक ऐसी इमारत तक पहुंची जो बाहर से बंद थी। अंदर जाने पर पता चला कि वहां छोटे-छोटे बच्चों से कपड़ा इकाई में मजदूरी कराई जा रही थी। कई बच्चे डरे हुए और बदहवास हालत में मिले। उनसे करीब 12 घंटे की शिफ्ट में काम लिया जा रहा था।

उन्होंने बताया कि कुछ बच्चों की हालत बेहद दयनीय थी। एक 8 वर्षीय बच्चा बिना शर्ट के मिला, जो दूसरे बच्चों से कपड़ा मांग रहा था ताकि अधिकारियों के सामने आ सके। पुलिस और अन्य एजेंसियों की त्वरित कार्रवाई के कारण इतने बड़े स्तर पर बच्चों को मुक्त कराया जा सका।

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि बाल तस्करी से जुड़े गिरोह बच्चों को सुबह-सुबह फैक्टरी में लाते थे और दिनभर इमारत को बाहर से बंद रखा जाता था। शाम को काम खत्म होने के बाद ही दरवाजे खोले जाते थे, ताकि किसी को अंदर बच्चों की मौजूदगी का पता न चले।

बच्चों को आसपास की कॉलोनियों में बेहद खराब परिस्थितियों में रखा गया था। छोटे-छोटे कमरों में 10 से 12 बच्चे एक साथ रहते थे, जहां बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव था। पूछताछ में कुछ बच्चों ने बताया कि उनके माता-पिता को मजदूरी की जानकारी थी, जबकि कई छोटे बच्चों को घूमाने के बहाने यहां लाया गया था।

जांच में यह भी सामने आया कि कुछ बच्चे पिछले तीन-चार वर्षों से फैक्टरी में काम कर रहे थे। मुक्त कराए गए बच्चों में राजस्थान के उदयपुर से लाए गए दो सगे भाई भी शामिल हैं, जिनकी उम्र 8 और 10 वर्ष बताई गई है।

बाल अधिकारों के लिए काम कर रहे संगठन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा कि यह मामला दर्शाता है कि बाल तस्करी और बाल मजदूरी का नेटवर्क कितना संगठित और गहरा हो चुका है। गरीब और जनजातीय क्षेत्रों के बच्चों को झूठे वादों के जरिए शहरों में लाकर शोषण का शिकार बनाया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों को रोकने के लिए राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, लगातार निगरानी और बाल मजदूरी करवाने वाले नियोक्ताओं व बिचौलियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई बेहद जरूरी है।

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