जांजगीर चांपा : अकलतरा में फ्लाई ऐश डंपिंग पर बड़ा सवाल, पानी से भरी खदानों में राखड़ भराव का आरोप
- DSS Admin
- Jun 01, 2026

जांजगीर चांपा/अकलतरा, 01 जून (हि. स.)। जांजगीर-चांपा जिले के अकलतरा विकासखंड में पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन का गंभीर मामला सामने आया है। ग्राम तरौद, किरारी, लटिया सहित आसपास के क्षेत्रों में स्थित चूना पत्थर की खुली खदानों में कथित तौर पर पानी से भरे गड्ढों में बड़े पैमाने पर फ्लाई ऐश (राखड़) डंप की जा रही है। इस मामले ने पर्यावरण विभाग, खनिज विभाग और डीजीएमएस (डायरेक्टरेट जनरल ऑफ माइन्स सेफ्टी) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि फ्लाई ऐश अर्थ मूवर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड सहित कई निजी कंपनियां पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी करते हुए हजारों टन औद्योगिक राखड़ का भराव कर रही हैं। सबसे चिंताजनक बात यह बताई जा रही है कि जिन खदानों में वर्षा का पानी भरा हुआ है, उन्हीं जलभराव वाले क्षेत्रों में सीधे फ्लाई ऐश डंप की जा रही है।
क्षेत्रीय कार्यालय छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल, बिलासपुर द्वारा फ्लाई ऐश भराव के लिए कई महत्वपूर्ण शर्तें निर्धारित की गई हैं। नियमों के अनुसार फ्लाई ऐश का उपयोग ऐसे स्थानों पर किया जाना चाहिए जहां जलभराव न हो और भराव कार्य वैज्ञानिक तरीके से किया जाए ताकि भूजल, जलस्रोतों और आसपास के पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। नियमों में यह भी उल्लेख है कि एक मीटर फ्लाई ऐश भराव के बाद मिट्टी की परत बिछाना अनिवार्य है। हालांकि ग्रामीणों का आरोप है कि कई खदानों में इन नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है और पानी के ऊपर ही सीधे राखड़ डंप की जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि कंपनियां लागत कम करने और अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर रही हैं। उनका दावा है कि यदि इसी तरह जलभराव वाली खदानों में राखड़ डंपिंग जारी रही तो भविष्य में भूजल प्रदूषित हो सकता है, जिसका असर क्षेत्र की कृषि, पशुपालन और जनस्वास्थ्य पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार फ्लाई ऐश में विभिन्न प्रकार के प्रदूषक तत्व और भारी धातुएं मौजूद हो सकती हैं। यदि वैज्ञानिक मानकों का पालन किए बिना इसका निस्तारण किया जाता है तो यह मिट्टी और जल स्रोतों के लिए दीर्घकालिक खतरा बन सकता है।
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिन खदानों में स्थायी रूप से पानी भरा हुआ है, वहां फ्लाई ऐश भराव की अनुमति किस आधार पर दी गई। क्या अनुमति जारी करने से पहले स्थल निरीक्षण किया गया था? क्या भूजल स्तर, जलग्रहण क्षेत्र और खदान की वास्तविक स्थिति का आकलन किया गया था? स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कई मामलों में जमीनी वास्तविकता की अनदेखी कर केवल दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी कर अनुमति प्रदान कर दी गई, जिसके कारण अब पर्यावरणीय जोखिम बढ़ता जा रहा है।
खनिज विभाग और डीजीएमएस की निगरानी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। ग्रामीणों का कहना है कि खदानों की वास्तविक गहराई, जलभराव की स्थिति और सुरक्षा मानकों का सत्यापन किया जाना चाहिए था। इसके अलावा कई स्थानों पर पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम, चेतावनी बोर्ड और बैरिकेडिंग की व्यवस्था भी नहीं होने की शिकायतें सामने आई हैं।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार अकलतरा क्षेत्र में लगभग 35 से अधिक सक्रिय और निष्क्रिय खदानें मौजूद हैं, जिनमें से करीब 20 खदानों में लगातार फ्लाई ऐश डंपिंग की जा रही है। दावा किया जा रहा है कि प्रतिदिन 1000 टन से अधिक राखड़ विभिन्न उद्योगों से लाकर इन खदानों में डाली जा रही है। सूत्रों का यह भी कहना है कि खदान संचालकों को प्रति टन के हिसाब से भुगतान किया जाता है, जिससे प्रतिदिन लाखों रुपये का कारोबार हो रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ खदान संचालक पुराने खनन कार्यों के दौरान बनी गहरी खदानों को अब फ्लाई ऐश से भरकर अपने पुराने कार्यों को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
मामले को लेकर क्षेत्र के ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने राज्य सरकार से उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। उन्होंने खदानों का स्वतंत्र वैज्ञानिक सर्वेक्षण, भूजल गुणवत्ता परीक्षण तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग उठाई है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते इस मामले में प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र को गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
इस संबंध में क्षेत्रीय पर्यावरण मंडल कार्यालय बिलासपुर की क्षेत्रीय अधिकारी रश्मि श्रीवास्तव ने कहा कि जल से भरी खदानों में राखड़ भराव करना पर्यावरणीय नियमों के विरुद्ध है। यदि तरौद और किरारी क्षेत्र में इस प्रकार की गतिविधियां संचालित हो रही हैं तो मामले की जांच कराई जाएगी और नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए नियम केवल कागजों तक सीमित रहेंगे या फिर उनके पालन को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार विभाग वास्तविक कार्रवाई भी करेंगे। अकलतरा क्षेत्र के ग्रामीणों की निगाहें अब जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

