दिलीप घोष की सियासी वापसी से बंगाल भाजपा में सरगर्मी तेज, लंबी और परिपक्व पारी के संकेत
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- Jan 03, 2026
कोलकाता, 03 जनवरी (हि. स.)। बंगाल भाजपा की राजनीति में एक बार फिर दिलीप घोष का नाम केंद्र में आया है। न्यू टाउन स्थित उनके आवास पर बढ़ती चहल-पहल, लगातार बजते फोन और पार्टी कार्यकर्ताओं की भीड़ इस बात का संकेत है कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अब केवल प्रतीकात्मक भूमिका में नहीं हैं। पार्टी के भीतर माना जा रहा है कि दिलीप घोष इस बार छोटी मौजूदगी के लिए नहीं, बल्कि लंबी और परिपक्व राजनीतिक पारी के इरादे से सक्रिय हुए हैं।
बीते कुछ वर्षों से दिलीप घोष एक तरह के राजनीतिक ठहराव में थे। वे पार्टी में बने रहे, केंद्रीय सुरक्षा और पार्टी की सुविधाएं भी जारी रहीं, लेकिन बड़े कार्यक्रमों और प्रधानमंत्री की रैलियों से उनकी दूरी साफ दिखती थी। पार्टी नेतृत्व का आधिकारिक बयान हमेशा अस्पष्ट रहा, जबकि घोष खुद यही कहते रहे कि वे कहीं गए नहीं हैं।
31 दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की बैठक में उनकी मौजूदगी के बाद यह स्थिति बदलती दिखी। पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह न्योता केंद्रीय पर्यवेक्षक सुनील बंसल के जरिए मिला था। इसे पार्टी के भीतर एक स्पष्ट संकेत माना गया कि दिलीप घोष का इंतजार खत्म हो चुका है।
इसके बाद हालात तेजी से बदले। पुराने समर्थक फिर सक्रिय हुए, जिला स्तर के कार्यकर्ता मिलने आने लगे और पार्टी दफ्तर में उनकी मौजूदगी बढ़ गई। स्थिति यह हो गई कि न्यू टाउन स्थित आवास की जगह अब विधाननगर भाजपा कार्यालय में उनसे मिलने वालों को भेजा जा रहा है, जहां उनके लिए एक अलग कक्ष तय किया गया है।
भाजपा के भीतर दिलीप घोष को संगठन का सबसे सफल प्रदेश अध्यक्ष माना जाता है। उनके कार्यकाल में पार्टी 2016 में तीन विधानसभा सीटों से बढ़कर 2021 में 77 सीटों तक पहुंची थी, जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें मिली थीं। 2021 के बाद की हिंसा और नेतृत्व परिवर्तन के चलते कार्यकर्ताओं में जो निराशा आई थी, घोष की वापसी से उसे दूर करने की कोशिश दिख रही है।
पार्टी में उनकी भूमिका को लेकर अलग-अलग आकलन हैं। कुछ इसे 2026 विधानसभा चुनाव से पहले एक मजबूत उम्मीदवार के तौर पर तैयार करने की रणनीति मानते हैं, तो कुछ इसे विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के इर्द-गिर्द बनी एकमात्र नेतृत्व की छवि को संतुलित करने की कोशिश के रूप में देखते हैं। दोनों नेता जनाधार वाले माने जाते हैं और लंबे समय से एक ही राजनीतिक स्पेस में सक्रिय रहे हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद दिलीप घोष और राज्य नेतृत्व के बीच दूरी और बढ़ी थी। सीट बदलने के बाद हार, संगठनात्मक फैसलों पर सार्वजनिक नाराजगी और दीघा में जगन्नाथ मंदिर उद्घाटन के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से उनकी मुलाकात को लेकर भी विवाद हुआ। इसके बाद कुछ समय के लिए उनकी राजनीतिक सक्रियता कम हो गई थी।
अब पार्टी नेतृत्व सार्वजनिक तौर पर संतुलित बयान दे रहा है। प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने कहा है कि अब तक घोष रणनीति बना रहे थे, अब वे पूरे मैदान में नजर आएंगे। हाल की तस्वीरों में विभिन्न गुटों के नेताओं के साथ उनकी सहज मौजूदगी को भी पार्टी एकता के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि दिलीप घोष की वापसी सिर्फ अतीत की याद नहीं है, बल्कि संगठन को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश है। 2026 के कठिन चुनावी साल से पहले पार्टी एक ऐसे चेहरे को फिर से आगे ला रही है, जो जमीनी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भर सके।
फिलहाल यह साफ नहीं है कि उन्हें कोई औपचारिक पद मिलेगा या नहीं, लेकिन बंगाल भाजपा की राजनीति में उनका बढ़ता असर यह बता रहा है कि दिलीप घोष इस बार सिर्फ मौजूदगी दर्ज कराने नहीं, बल्कि लंबी पारी खेलने लौटे हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर



