राजा नहीं, परंपरा कायम- चांचल में जिंदा है सौहार्द

मालदा, 26 जून (हि. स.)। राजतंत्र भले ही कई साल पहले खत्म हो गया हो और राजा अब इतिहास के पन्नों में सिमट गए हों, लेकिन पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के चांचल में आज भी एक ऐसी परंपरा जीवित है, जो इतिहास, विरासत और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करती है।

हर साल की तरह इस बार भी मोहर्रम की नौवीं रात को खेलेनपुर मोहर्रम कमेटी के नेतृत्व में मुस्लिम समुदाय के लोग ताजिया को कंधे पर उठाकर चांचल के ऐतिहासिक राजबाड़ी तक पहुंचे। राजबाड़ी परिसर में ताजिया रखकर विशेष प्रार्थना की गई। इस दौरान एक भावुक और सौहार्दपूर्ण माहौल देखने को मिला, जहां हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग अपने-अपने धार्मिक तरीकों से एक साथ शामिल हुए। एक ओर लोग हाथ जोड़कर नमस्कार कर रहे थे, तो दूसरी ओर दुआ के लिए हाथ उठाए गए—यह दृश्य आपसी एकता और भाईचारे का जीवंत प्रतीक बन गया।

खेलेनपुर मोहर्रम कमेटी के सचिव लालटू सरकार ने बताया कि जनश्रुति के अनुसार चांचल के तत्कालीन राजा शरतचंद्र राय बहादुर ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। वह खुद रानी के साथ राजमहल से मोहर्रम का आयोजन देखते थे। उसी समय से ताजिया को राजबाड़ी लाने की परंपरा शुरू हुई। समय के साथ राजतंत्र समाप्त हो गया, लेकिन इस परंपरा और सौहार्द की भावना को आज भी स्थानीय लोग संजोए हुए है।

लालटू सरकार ने कहा कि हर साल मोहर्रम की नौवीं रात को हम ताजिया लेकर राजबाड़ी आते है। यहां सभी समुदाय के लोग एक साथ प्रार्थना करते है। राजा भले ही अब नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा शुरू किया गया यह सौहार्द आज भी कायम है।

उन्होंने यह भी बताया कि प्रशासन के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए इस साल भी बिना डीजे और बिना किसी हथियार के पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से जुलूस निकाला गया। धर्म और जाति से ऊपर उठकर चांचल की यह सदियों पुरानी परंपरा सामाजिक एकता और भाईचारे का एक बेहतरीन उदाहरण है। मोहर्रम की नौवीं का यह आयोजन अब सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि चांचल की सांस्कृतिक पहचान और सांप्रदायिक सौहार्द का अनोखा उत्सव बन चुका है।

   

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