कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर को मिली 100.15 लाख की अनुसंधान परियोजना
- DSS Admin
- May 23, 2026
धर्मशाला, 23 मई (हि.स.)। चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के नेशनल एग्रीकल्चरल साइंस फंड द्वारा 100.15 लाख की एक प्रतिष्ठित अनुसंधान परियोजना प्रदान की गई है। इस परियोजना में कृषि विश्वविद्यालय प्रमुख संस्थान के रूप में कार्य करेगा, जिसे देश के प्रमुख साझेदार संस्थानों के सहयोग से क्रियान्वित किया जाएगा। इनमें पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना, नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज, नई दिल्ली, तथा विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा, उत्तराखंड, शामिल हैं। यह परियोजना तीन वर्षों तक चलेगी और इसका उद्देश्य गेहूं की प्रमुख जैविक तनावों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना है।
इस उपलब्धि की घोषणा करते हुए कुलपति डॉ. अशोक कुमार पांडा ने कहा कि यह परियोजना विश्वविद्यालय के लिए गर्व की बात है। यह राष्ट्रीय स्तर पर कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता का प्रमाण है। उन्होंने डॉ. विजय राणा के नेतृत्व में संपूर्ण टीम को इस महत्वपूर्ण परियोजना को संस्थान में लाने के लिए उनकी समर्पित प्रयासों पर बधाई दी।
वनस्पति प्रजनन एवं आनुवंशिकी विभागाध्यक्ष प्रो. जय देव ने परियोजना की जानकारी देते हुए बताया कि इसका उद्देश्य विविध और अभी तक कम उपयोग में लाई गई आनुवंशिक संसाधनों जैसे कि जंगली प्रजातियों से प्राप्त पंक्तियाँ, ट्रिटिकेल × गेहूं संकर, और पारंपरिक देशी नस्लों का उपयोग कर गेहूं में रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करना है। उन्होंने कहा कि, इन संसाधनों में ऐसी विशेषताएं हैं जो अधिक टिकाऊ और उन्नत गेहूं किस्मों के विकास में सहायक हो सकती हैं।
परियोजना की प्रधान अन्वेषक डॉ. विजय राणा ने बताया कि अनुसंधान में इन जर्मप्लाज्म की खेत आधारित मूल्यांकन, तीव्र प्रजनन तकनीकों के माध्यम से श्रेष्ठ गेहूं किस्मों में नवीन रोग प्रतिरोधी जीन की प्रविष्टि, तथा तैयार पंक्तियों की उपज और गुणवत्ता के प्रारंभिक मूल्यांकन पर फोकस किया जाएगा।
परियोजना का एक अन्य उद्देश्य पाउडरी मिल्ड्यू और पीली रतुआ के लिए व्यापक आनुवंशिक आधार वाली किस्मों और जीनोटाइप्स का विकास करना है। साथ ही हिमाचल प्रदेश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बीजीटी रोगजनक की प्रचलित जातियों की पहचान करके उसके विषाणु स्वरूप की विविधता को समझने पर भी कार्य किया जाएगा। यह अनुसंधान पहल जलवायु परिवर्तन और उभरती हुई पौध बीमारियों के परिप्रेक्ष्य में स्थायी कृषि को बढ़ावा देने और भारत की खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

