धर्मशाला, 04 जुलाई (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश में अब सांप के काटने (सर्पदंश) से होने वाली अकाल मौतों को रोकने के लिए सरकार ने युद्धस्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। इस दिशा में एक ऐतिहासिक और बड़ा कदम उठाते हुए प्रदेश में सर्पदंश को 'नोटीफायबल' (अधिसूच्य) रोग घोषित कर दिया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब सांप काटने के हर एक मामले की सूचना स्वास्थ्य विभाग को देना अनिवार्य होगा। 'जीरो स्नेकबाइट डेथ' (शून्य सर्पदंश मृत्यु) के लक्ष्य को हासिल करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के संयुक्त तत्वावधान में एक ठोस राज्य स्तरीय कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
इस महत्वपूर्ण कार्ययोजना को अमलीजामा पहनाने के लिए शनिवार को धर्मशाला के जोनल अस्पताल में एक उच्च स्तरीय स्टेकहोल्डर बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में स्वास्थ्य, वन, शिक्षा, कृषि, जल शक्ति और पशुपालन सहित तमाम विभागों के अधिकारियों व विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, कोच्चि के डॉ. जयदीप सी. मेनन ने बताया कि आईसीएमआर समर्थित 'जीरो स्नेकबाइट डेथ' परियोजना वर्तमान में देश के सात राज्यों में चलाई जा रही है। हिमाचल में इसे कांगड़ा जिले के ज्वालामुखी और नूरपुर ब्लॉक में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया है। इन दोनों ब्लॉक्स में मिलने वाली सफलता के बाद इस मॉडल को पूरे कांगड़ा और फिर समूचे प्रदेश में लागू किया जाएगा।
आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में हर साल करीब 100 लोगों की जान सर्पदंश के कारण चली जाती है। डॉ. मेनन ने स्पष्ट किया कि पहाड़ी इलाकों में अस्पताल पहुंचने में होने वाली देरी और 'झाड़-फूंक' जैसी कुप्रथाएं इन मौतों का सबसे बड़ा कारण हैं। उन्होंने एक अहम तथ्य साझा करते हुए बताया कि 70 से 80 प्रतिशत मामलों में सांप जहरीले होते ही नहीं हैं। लेकिन अगर कोई जहरीला सांप काट ले, तो मरीज को 'गोल्डन ऑवर' (शुरुआती अहम समय) के भीतर अस्पताल पहुंचाना बेहद जरूरी है। इसका एकमात्र प्रमाणित और वैज्ञानिक इलाज 'एंटी-स्नेक वेनम' है, जो प्रदेश के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) तक में उपलब्ध है। बैठक में यह भी उभर कर आया कि हिमाचल में पाए जाने वाले 'माउंटेन पिट वाइपर' जैसे स्थानीय विषैले सांपों के लिए भविष्य में अधिक प्रभावी वेनम विकसित करने की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत सर्पदंश कार्यक्रम के प्रभारी डॉ. ओमेश भारती ने इस पहल के दूरगामी परिणामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सर्पदंश के 'नोटीफायबल' रोग घोषित होने से अब प्रदेश में इसके वास्तविक और पारदर्शी आंकड़े सामने आ सकेंगे। इससे उन 'हॉटस्पॉट' क्षेत्रों की सटीक पहचान हो सकेगी जहां सर्पदंश की घटनाएं अधिक होती हैं, जिससे वहां मेडिकल सुविधाएं और जागरूकता अभियान केंद्रित किए जा सकेंगे।

