तृणमूल कांग्रेस के कुणाल घोष का बयान, चुनावी हार ने पार्टी के भीतर छिपे ‘गद्दारों’ को उजागर किया

कुणाल घोष

कोलकाता, 04 मई (हि. स.)। तृणमूल कांग्रेस के विधायक और पत्रकार से नेता बने कुणाल घोष ने सोमवार को कहा कि हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की करारी हार आवश्यक थी, क्योंकि इससे संगठन के भीतर मौजूद कथित गद्दारों की पहचान हो सकी है।

उन्होंने परोक्ष रूप से पार्टी के भीतर चल रहे उस धड़े को निशाना बनाया, जिसे पूर्व विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला ‘विद्रोही बहुमत’ बताया जा रहा है। पार्टी के राज्य प्रवक्ता घोष ने कहा कि यदि इस बार तृणमूल कांग्रेस की बड़ी हार नहीं होती, तो ऐसे लोगों का असली चेहरा सामने नहीं आता।

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखे संदेश में कहा कि चार मई को उन्हें पार्टी की हार से व्यक्तिगत रूप से दुख हुआ था, और बेलियाघाटा विधानसभा क्षेत्र से उनकी अपनी जीत भी उन्हें खास खुशी नहीं दे सकी थी। लेकिन अब उन्हें लगता है कि जो हुआ वह पार्टी के हित में था।

घोष के अनुसार, यदि तृणमूल कांग्रेस सत्ता में लौटती, तो अवसरवादी लोग मित्र बनकर पार्टी के भीतर घुस जाते और नेतृत्व के आसपास खुद को स्थापित कर लेते। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोग खुद को संत के रूप में प्रस्तुत कर और अधिक अनियंत्रित तरीके से लाभ उठाते, जबकि पार्टी के भीतर अनुशासन और नैतिकता कमजोर पड़ती।

उन्होंने यह भी कहा कि कुछ कथित अपराधी तत्व पार्टी के भीतर अपने विरोधियों पर अत्यधिक दबाव बनाते और यहां तक कि पार्टी के भीतर ही एक वर्ग को प्रताड़ित करते। साथ ही, कुछ गैर राजनीतिक हस्तियां राजनीतिक मंचों का दुरुपयोग करतीं और जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर व्यक्तिगत लाभ उठातीं।

कुणाल घोष ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस, नौकरशाही, बुद्धिजीवियों, उद्योगपतियों और तथाकथित अर्ध-बौद्धिक वर्ग का एक हिस्सा भी अपने हित साधने के लिए राजनीतिक मंचों का इस्तेमाल करता। उनके अनुसार, इससे समर्पित कार्यकर्ता और जमीनी समर्थक पार्टी के भीतर उपेक्षित और असहज महसूस करते।

उन्होंने कहा कि इस चुनावी परिणाम ने भले ही पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया हो, लेकिन इससे संगठन के भीतर जमी हुई समस्याओं और कथित अवांछित तत्वों की सफाई का अवसर मिला है। घोष ने दावा किया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में वास्तविक और समर्पित कार्यकर्ता भविष्य में पार्टी को मजबूत करेंगे।

अपने संदेश के अंत में उन्होंने कहा कि सत्ता-केन्द्रित और अवसरवादी राजनीतिक प्रवृत्तियों के खिलाफ खड़ा होना आसान नहीं होता, लेकिन जनता सब देख रही है और अंततः वही अंतिम निर्णय देगी।

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