
अररिया 18 मई(हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष पर श्री रानी सरस्वती विद्या मंदिर के सभागार में सोमवार को प्रमुख जन गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्रबुद्ध नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक, युवा एवं विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों की सहभागिता रही।
वर्ष 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यक्रम में संघ की सेवा, संस्कार एवं राष्ट्र निर्माण की गौरवशाली यात्रा पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला संघचालक सच्चिदानंद मेहता ने किया। मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्तर बिहार के प्रांत महाविद्यालय छात्र कार्य प्रमुख राकेश ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक महान सांस्कृतिक चेतना है। उन्होंने कहा कि विश्व की अनेक प्राचीन संस्कृतियां समय के साथ समाप्त हो गईं। लेकिन भारत की सनातन परंपरा, योग, आयुर्वेद एवं कला आज भी समाज जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।
उन्होंने कहा कि भारत में दान से अधिक सेवा एवं त्याग को महत्व दिया गया है। भारतीय संस्कृति हमें समस्त विश्व को एक परिवार मानने की प्रेरणा देती है। यही सांस्कृतिक एकता भारत को केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं रखती, बल्कि एक अखंड राष्ट्र के रूप में स्थापित करती है। भारत को समझने के लिए इसकी ज्ञान परंपरा, अध्यात्म एवं जीवन पद्धति को समझना आवश्यक है।
राकेश ने कहा कि संघ का शताब्दी वर्ष केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपने दायित्वों को और अधिक सशक्त रूप से निभाने का संकल्प है।
कार्यक्रम में पंच परिवर्तन के अंतर्गत सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण,स्व का बोध एवं नागरिक कर्तव्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई। पर्यावरण एवं जल संरक्षण को नागरिक कर्तव्य बताते हुए उन्होंने स्वदेशी जीवनशैली, भारतीय भाषा, वेशभूषा एवं सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण पर बल दिया।
कार्यक्रम में उपस्थित नागरिकों ने प्रश्नोत्तरी के माध्यम से संघ के दृष्टिकोण एवं कार्यों की जानकारी प्राप्त की। अध्यक्षीय उद्बोधन कार्यक्रम के अध्यक्ष अजीत कुमार मंडल ने किया। कार्यक्रम का समापन वंदेमातरम् के साथ हुआ।

