परमहंस आश्रम में माता शबरी प्रसंग का हुआ भावपूर्ण वर्णन

- रामभक्ति का संदेश सुन भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

मीरजापुर, 02 जुलाई (हि.स.)। चुनार क्षेत्र के सक्तेशगढ़ स्थित परमहंस आश्रम के प्रवचन हाल में गुरुवार सुबह स्वामी अड़गड़ानंद महाराज ने भगवान श्रीराम और माता शबरी के प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। उनके प्रवचन को सुनकर उपस्थित श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर हो गए।

स्वामी अड़गड़ानंद महाराज ने कहा कि माता शबरी का वास्तविक नाम श्रमणा था। वह भील समुदाय की शबर जाति से थीं। बचपन से ही उनका मन जीव-हिंसा से व्यथित रहता था। विवाह के अवसर पर पशु-पक्षियों की बलि की परंपरा से आहत होकर उन्होंने घर त्याग दिया और दंडकारण्य में मातंग ऋषि के आश्रम पहुंचकर निष्काम सेवा को ही अपनी साधना बना लिया।

उन्होंने बताया कि मातंग ऋषि ने उनकी सेवा से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया था कि एक दिन स्वयं भगवान श्रीराम उनके आश्रम आएंगे। गुरु के देहत्याग के बाद शबरी आजीवन प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा करती रहीं। वनवास के दौरान जब भगवान श्रीराम और लक्ष्मण उनकी कुटिया पहुंचे तो शबरी ने प्रेमपूर्वक अपने चखे हुए मीठे बेर अर्पित किए। भगवान श्रीराम ने प्रेम और श्रद्धा से अर्पित उन बेरों को सहर्ष स्वीकार कर भक्ति की महिमा का संदेश दिया।

स्वामी अड़गड़ानंद महाराज ने वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड का उल्लेख करते हुए भगवान श्रीराम द्वारा बताए गए नवधा भक्ति के नौ स्वरूप—सत्संग, कथा-श्रवण, गुरु-सेवा, नाम-जप, दृढ़ विश्वास, सदाचार, समदृष्टि, संतोष और सरलता—का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि माता शबरी का जीवन यह संदेश देता है कि ईश्वर की प्राप्ति बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि निष्काम सेवा, धैर्य, श्रद्धा और निर्मल हृदय से होती है। प्रवचन के उपरांत श्रद्धालुओं ने स्वामी अड़गड़ानंद महाराज का आशीर्वाद प्राप्त किया।

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