वीर सावरकर त्याग, साहस और समर्पण के जीवंत प्रतीक थे- प्रो आनंद भालेराव
- DSS Admin
- May 29, 2026
अजमेर, 29 मई(हि.स.)। यदि महात्मा गांधी ने भारत की आत्मा को नैतिक प्रतिरोध की शक्ति दी, यदि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारत को सैन्य प्रतिरोध का स्वर दिया, तो वीर सावरकर ने भारत को राष्ट्रीय सामर्थ्य का बौद्धिक ढांचा प्रदान किया। वे केवल बंदूक की भाषा नहीं जानते थे, बल्कि मनोवैज्ञानिक युद्ध, सांस्कृतिक पुनरुत्थान, राजनीतिक संगठन, सैनिकीकरण, इतिहास लेखन और राष्ट्रीय मानस निर्माण के रणनीतिक चिंतक थे।
यह विचार राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आनंद भालेराव ने वीर विनायक दामोदर सावरकर जयंती के अवसर पर विश्वविद्यालय में आयोजित भव्य कार्यक्रम को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति प्रो. आनंद भालेराव द्वारा वीर सावरकर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। अपने उद्बोधन में कुलपति प्रो. भालेराव ने कहा कि सावरकर जी का मानना था कि जिस राष्ट्र का इतिहास पराजय की भाषा में लिखा जाता है, उसके युवाओं का आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है। इसी उद्देश्य से उन्होंने भारतीय इतिहास को नए दृष्टिकोण से पुनर्परिभाषित किया। उन्होंने “अभिनव भारत” की स्थापना की और राष्ट्रवाद को नई वैचारिक दिशा प्रदान की।
उन्होंने बताया कि सावरकर एक अत्यंत दूरदर्शी एवं नवोन्मेषी चिंतक थे, जिन्होंने प्रतिरोध की नई संरचना को तीन स्तरों पर स्थापित किया—भय को तोड़ना, इतिहास-साहित्य और राष्ट्रीयता की नई व्याख्या करना तथा सैनिकीकरण के माध्यम से राष्ट्र को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना।
कुलपति प्रो. आनंद भालेराव ने सावरकर की प्रसिद्ध कविता “ने मजसी ने परत मातृभूमिला” का उल्लेख करते हुए उसके भावार्थ को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि इस कविता में सावरकर जी का मातृभूमि के प्रति अथाह प्रेम और समर्पण झलकता है, जिसमें वे सागर से अपनी जन्मभूमि वापस ले चलने की प्रार्थना करते हैं।
प्रो. भालेराव ने कहा कि सावरकर जी परंपराओं के समर्थक अवश्य थे, किंतु अंधपरंपराओं के नहीं। वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तकनीकी विकास, औद्योगीकरण और सैन्य आधुनिकीकरण के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि उन्हें बौद्धिक रूप से सशक्त, शारीरिक रूप से अनुशासित, सांस्कृतिक रूप से जड़ों से जुड़ा तथा वैज्ञानिक दृष्टि से आधुनिक बनना होगा। साथ ही उन्हें अपनी सभ्यतागत जिम्मेदारियों को भी समझना चाहिए। उन्होंने सावरकर के जीवन से जुड़े अनेक प्रेरणादायी प्रसंग साझा करते हुए बताया कि किस प्रकार उन्होंने असहनीय यातनाएँ सहते हुए भी राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा और अपना संपूर्ण जीवन मातृभूमि को समर्पित कर दिया। उन्होंने कहा कि सावरकर त्याग, साहस और समर्पण के जीवंत प्रतीक थे।
सावरकर ने महिलाओं की भूमिका पर भी विशेष बल देते हुए कहा था कि महिलाओं में साहस और आत्मविश्वास का विकास होना चाहिए तथा उन्हें नई पीढ़ी को राष्ट्ररक्षा और राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करना चाहिए। उन्होंने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के पराक्रम को आदर्श बताते हुए कहा कि उनका साहस भारतीय नारी शक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है।
कुलपति प्रो. आनंद भालेराव ने कहा कि यह अत्यंत आवश्यक है कि हम ऐसे महान क्रांतिकारियों से प्रेरणा लें, जिन्होंने यह सिखाया कि जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ हों, मातृभूमि का स्थान सदैव सर्वोपरि होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कि विश्वविद्यालय में महापुरुषों की जयंती मनाने की परंपरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक पुण्य कार्य है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति, त्याग, साहस और आदर्श जीवन मूल्यों से प्रेरणा मिलती है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों ने वीर विनायक दामोदर सावरकर की प्रतिमा के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित की। अंत में कुलसचिव अमरदीप शर्मा ने वीर सावरकर के बलिदान को नमन करते हुए सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन जनसंपर्क अधिकारी अनुराधा मित्तल ने किया।
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