बंगाल सरकार ने खत्म की मजहब के आधार पर ओबीसी उप-वर्गीकरण व्यवस्था, नये सिरे से समीक्षा के आदेश
- DSS Admin
- May 18, 2026
कोलकाता, 18 मई (हि.स.)। पश्चिम बंगाल की नई भारतीय जनता पार्टी सरकार ने सोमवार को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण व्यवस्था को लेकर बड़ा और अहम फैसला लिया। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अध्यक्षता में नवान्न में हुई राज्य मंत्रिमंडल की दूसरी बैठक में मौजूदा ओबीसी उप-वर्गीकरण व्यवस्था को समाप्त करने और राज्य की ओबीसी सूची की नई सिरे से समीक्षा कराने का निर्णय लिया गया।
बैठक के बाद आयोजित संवाददाता सम्मेलन में राज्य की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि मंत्रिमंडल ने ओबीसी श्रेणी के भीतर लागू मौजूदा उप-वर्गीकरण व्यवस्था को खत्म करने और राज्य सरकार की नौकरियों में ओबीसी आरक्षण के प्रतिशत की पुनर्समीक्षा का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में नई जांच कराई जाएगी और समुदायों को सूची में शामिल करने का निर्णय कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार लिया जाएगा।
ओबीसी आरक्षण और उप-वर्गीकरण का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और कानूनी विवाद का केंद्र रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार ने 2012 के बाद जारी कई प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदायों को ओबीसी सूची में शामिल किया था। आधिकारिक जानकारी के अनुसार उस अवधि में कुल 77 नए समुदायों को सूची में जोड़ा गया था, जिनमें 75 मुस्लिम उप-समुदाय थे।
उस समय विपक्ष में रही भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस सरकार पर मजहब आधारित आरक्षण के जरिए अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का आरोप लगाया था। बाद में इस नीति को अदालत में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग की वैधानिक भूमिका को दरकिनार करते हुए बिना समुचित सामाजिक और आर्थिक सर्वेक्षण के आरक्षण का लाभ दिया।
मई 2024 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 2010 के बाद संशोधित व्यवस्था के तहत जारी सभी ओबीसी प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि ओबीसी दर्जा देने में मजहब ही “एकमात्र आधार” बन गया था, जो असंवैधानिक है। हालांकि न्यायालय ने 2010 से पहले जारी प्रमाणपत्रों को सुरक्षित रखा और यह भी स्पष्ट किया कि आरक्षण के आधार पर पहले से नौकरी प्राप्त कर चुके लोगों की सेवाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
उच्च न्यायालय के फैसले के बाद तत्कालीन राज्य सरकार ने नई उप-श्रेणियों की सूची जारी कर ओबीसी ढांचे को पुनर्गठित करने की कोशिश की थी, लेकिन अदालत ने उस अधिसूचना पर भी रोक लगा दी थी। न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि राज्य सरकार ने अत्यधिक जल्दबाजी दिखाई और उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
बाद में मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा, जहां अदालत ने राज्य सरकार से समुदायों को ओबीसी सूची में शामिल करने के समर्थन में तथ्यात्मक और सामाजिक-आर्थिक आंकड़े मांगे थे। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि केवल धार्मिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता और इसके लिए सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन के स्पष्ट मानक जरूरी हैं।
अधिकारियों के अनुसार नई समीक्षा प्रक्रिया में विस्तृत जांच और आंकड़ा आधारित मूल्यांकन किया जाएगा। सरकार आने वाले सप्ताहों में संशोधित ढांचे को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश और नई अधिसूचनाएं जारी कर सकती है।

