एटक ने सरकार पर लगाया फंड के दुरुपयोग का आरोप

राजन गोसाईं | अमृतसर विभिन्न औद्योगिक इकाइयों में कार्यरत कामगारों और उनके परिवारों को इलाज के बाद मिलने वाले मेडिकल रीइंबर्समेंट भुगतान में देरी का सामना करना पड़ रहा है। ईएसआई अस्पताल के डायरेक्टर कम एमएस डॉ. अश्वनी कुमार ने बताया कि अस्पताल से संबंधित करीब 18 लाख रुपए के मेडिकल बिल फिलहाल ट्रेजरी स्तर पर लंबित हैं। इसके समाधान के लिए मुख्यालय से 20 लाख के अतिरिक्त बजट की मांग की गई है। अस्पताल स्तर पर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन भुगतान ट्रेजरी के माध्यम से सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में होना है। डॉ. अश्वनी कुमार ने बताया कि अस्पताल स्तर पर आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है, जबकि भुगतान ट्रेजरी के माध्यम से लाभार्थियों के खातों में जारी किया जाता है। भुगतान लंबित रहने के कारण बड़ी संख्या में कामगार और उनके परिजन अस्पताल प्रशासन से संपर्क कर रहे हैं। लेकिन उन्हें अपने दावों की स्थिति को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं मिल रही, जिसके चलते उन्हें बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। एटक पंजाब के डिप्टी जनरल सेक्रेटरी अमरजीत सिंह आसल ने आरोप लगाया कि ईएसआई कॉर्पोरेशन से मिलने वाले फंड का पंजाब सरकार अन्य कार्यों में उपयोग करती है, जिससे यह समस्या पैदा होती है। उन्होंने बताया कि लुधियाना का ईएसआई अस्पताल सीधे दिल्ली कॉर्पोरेशन के अधीन है, इसलिए वहां ऐसी दिक्कत नहीं आती, जबकि अमृतसर का अस्पताल पंजाब सरकार के अधीन है। आसल ने मांग की कि अमृतसर समेत राज्य के सभी ईएसआई अस्पतालों को सीधे दिल्ली कॉर्पोरेशन के अधीन किया जाए।।उन्होंने मांग की कि अमृतसर समेत अन्य जिलों के ईएसआई अस्पतालों को भी सीधे ईएसआई कारपोरेशन, दिल्ली के अधीन किया जाना चाहिए, ताकि कर्मचारियों और उनके आश्रितों को समय पर चिकित्सा सुविधाएं और रीइंबर्समेंट भुगतान मिल सके। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि लंबित मेडिकल दावों का भुगतान जल्द जारी नहीं किया गया तो आंदोलन करेंगे। .मंजूरी का अधिकार: 10 हजार से 49 हजार रुपये तक के मेडिकल दावों को मंजूरी देने का अधिकार स्थानीय एमएस के पास होता है, जबकि 50 हजार से अधिक के दावे उच्च कार्यालय भेजे जाते हैं। अंतिम भुगतान ट्रेजरी के जरिए ऑनलाइन ट्रांसफर होता है। रेफरल व्यवस्था: अस्पताल में सामान्य बीमारियों का इलाज होता है। गंभीर ऑपरेशनों के लिए मरीजों को गुरु नानक देव अस्पताल और दिल, किडनी, न्यूरो व कैंसर जैसी सुपर-स्पेशलिटी बीमारियों के लिए मान्यता प्राप्त निजी व सरकारी अस्पतालों में रेफर किया जाता है। कामगारों के लिए स्थापित इस अस्पताल की मौजूदा व्यवस्थाएं भी तीखे सवालों के घेरे में हैं। अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को ओपीडी पर्ची बनवाने, डॉक्टरों को दिखाने और फिर दवाइयां लेने के लिए अलग-अलग लंबी कतारों में घंटों इंतजार करना पड़ता है। अपनी दिहाड़ी छोड़कर अस्पताल पहुंचने वाले इन गरीब श्रमिकों का अधिकांश समय केवल औपचारिकताओं और कतारों में ही बीत जाता है। इससे उन्हें आर्थिक नुकसान के साथ-साथ गंभीर मानसिक परेशानी भी झेलनी पड़ रही है।

   

सम्बंधित खबर