गोरुमारा में गहराता पर्यटन संकट, घटती भीड़ से स्थानीय आजीविका पर असर

जलपाईगुड़ी, 01 जनवरी (हि. स.)। दिन-ब-दिन गोरुमारा में पर्यटकों की संख्या घटती जा रही है। छुट्टियों के व्यस्त मौसम में ठंड का आनंद लेने बड़ी संख्या में पर्यटक उत्तर बंगाल का रुख कर रहे है, लेकिन इसका लाभ गोरुमारा को नहीं मिल पा रहा है। स्थानीय पर्यटन व्यवसायियों और आसपास के वन बस्तियों के निवासियों की आय के आंकड़े इसी ओर इशारा कर रहे है।

कुछ साल पहले तक डुआर्स का प्रमुख पर्यटन केंद्र गोरुमारा पर्यटकों से खचाखच भरा रहता था।

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 में गोरुमारा में 60 हजार से अधिक पर्यटक पहुंचे थे। लेकिन कोरोना के बाद हर साल यह संख्या घटकर 30 से 35 हजार के बीच सिमट गई है। हैरानी की बात यह है कि इसी दौरान गोरुमारा के आसपास लगातार नए रिसॉर्ट और होटल बनते जा रहे है। बावजूद इसके आरोप है कि राज्य और राज्य के बाहर सरकारी स्तर पर गोरुमारा के पर्यटन का पर्याप्त प्रचार नहीं किया जा रहा।

पर्यटन व्यवसायियों का कहना है कि जलदापाड़ा में जंगल सफारी और वॉच टावर (नजरमीनार) एक ही टिकट में देखे जा सकते है, जबकि गोरुमारा में इसके लिए अलग-अलग टिकट लेने पड़ते है। इससे पर्यटकों को ज्यादा खर्च करना पड़ता है। नतीजतन, जलदापाड़ा में पर्यटकों की भीड़ बढ़ रही है और गोरुमारा धीरे-धीरे खाली होता जा रहा है।

गोरुमारा के आसपास बिचाभांगा, सरस्वती, रामशाई, मूर्ति, पानझोरा सहित कई बस्तियों की महिलाएं आदिवासी नृत्य प्रस्तुत कर या हस्तशिल्प बेचकर रोज़ाना 20 से 25 हजार रुपये तक की कमाई करती थी। अब यह आय घटकर मात्र सात से आठ हजार रुपये रह गई है। बिचाभांगा की आदिवासी नृत्य टोली की नेत्री सबिता पाइका का कहना है कि नृत्य और हस्तशिल्प सीखकर आत्मनिर्भर बनीं कई महिलाएं अब दोबारा चाय बागानों में काम करने को मजबूर हो रही है। कुछ महिलाएं फिर से जंगल में ईंधन की तलाश में जाने लगी हैं।

स्थिति यह है कि रामशाई इलाके में पहले जहां तीन आदिवासी नृत्य दल सक्रिय थे, अब केवल चटुआ वन बस्ती का एक ही दल बचा है। कालीराम और बुधुराम वन बस्ती के नृत्य दलों ने प्रदर्शन बंद कर दिया है।

स्थानीय जॉइंट फारेस्ट मैनेजमेंट कमेटी के सचिव सुबल पाइका ने भी पर्यटकों की संख्या घटने की बात स्वीकार की है और प्रशासन से इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देने की मांग की है।

गोरुमारा टूरिज्म वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष तजमल हक ने भी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सरकारी पहल तेज करने की जरूरत बताई। वहीं, डुआर्स टूरिज्म डेवलपमेंट फोरम के संयुक्त सचिव दिव्येंदु देव का कहना है कि बीते कुछ वर्षों में पूरे डुआर्स क्षेत्र में पर्यटकों की आवक कम हुई है और क्षेत्र का समुचित प्रचार नहीं हो पा रहा। गोरुमारा और लाटागुड़ी में जंगल सफारी और वॉच टावर देखने के लिए छह लोगों का खर्च करीब पांच हजार रुपये तक पहुंच जाता है, जबकि जलदापाड़ा में यही खर्च दो हजार रुपये से भी कम है। इसी कारण पर्यटक जलदापाड़ा को अधिक पसंद कर रहे है।

हालांकि, उत्तर बंगाल के प्रधान मुख्य वन संरक्षक भास्कर जेवी का कहना है कि पर्यावरणीय कारणों से जलदापाड़ा और गोरुमारा में सफारी और वॉच टावर की व्यवस्था अलग-अलग रखी गई है और इसमें बदलाव संभव नहीं है।

वहीं, जिला अतिरिक्त जिलाधिकारी (पर्यटन) हरीश रशीद ने बताया कि सरकारी स्तर पर विभिन्न राज्यों में डुआर्स पर्यटन के प्रचार के प्रयास किए जा रहे है।

हिन्दुस्थान समाचार / सचिन कुमार

   

सम्बंधित खबर