रवीन्द्रनाथ ठाकुर जीवन को संपूर्णता में देखने के पक्षधर थे: नवीन नीरज
- DSS Admin
- May 30, 2026
नई दिल्ली, 30 मई (हि.स.)। नोबेल पुरस्कार विजेता एवं साहित्यकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर के निबंधों पर आयोजित एक चर्चा में वक्ताओं ने उनके चिंतन को भारतीय जीवन-दृष्टि, मानवतावाद और विश्वबंधुत्व का महत्वपूर्ण आधार बताया। कार्यक्रम का आयोजन शनिवार को अखिल भारतीय साहित्य परिषद् द्वारा प्रवासी भवन में किया गया।
युवा साहित्यकार डॉ. नवीन नीरज ने कहा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर समग्रता में विचार प्रस्तुत करते थे और जीवन को टुकड़ों में नहीं, बल्कि संपूर्णता में देखने के पक्षधर थे। उन्होंने कहा कि ठाकुर केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक प्रखर विचारक भी थे, जिनके निबंध भारतीय जीवन-दृष्टि को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
डॉ. नीरज ने कहा कि अपने शुरुआती दौर में रवीन्द्रनाथ ठाकुर यूरोपीय जीवन-मूल्यों से प्रभावित थे, लेकिन समय के साथ उनके विचारों में परिवर्तन आया और उन्होंने भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को देश की वास्तविक शक्ति के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि ठाकुर का ध्येय मनुष्य को उसकी सीमाओं से ऊपर उठाकर वैश्विक नागरिकता की भावना से जोड़ना था।
लेखिका प्रिया वरुण कुमार ने कहा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के निबंधों में प्रकृति, शिक्षा और समाज सुधार से जुड़े गहन विचार मिलते हैं। उन्होंने कहा कि ठाकुर का साहित्य मानवतावाद और विश्वबंधुत्व का संदेश देता है, जो आज भी प्रासंगिक है।
पुस्तक-चर्चा का संचालन करते हुए शोधार्थी अजीत कुमार ने कहा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की विचारधारा का मूल आधार उनका गहरा धर्म-बोध था। उन्होंने बताया कि ठाकुर के पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर की आध्यात्मिक साधना का उनके व्यक्तित्व और चिंतन पर गहरा प्रभाव पड़ा। साथ ही प्रकृति के प्रति उनकी संवेदनशीलता ने उनके धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण को और समृद्ध किया। सूर्योदय, ऋतु-परिवर्तन, मेघ, वर्षा और नदियों की धारा जैसे प्राकृतिक तत्व उनके चिंतन के महत्वपूर्ण स्रोत रहे।
कार्यक्रम में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के केंद्रीय कार्यालय सचिव संजीव सिन्हा, पवन कुमार अरविंद, विकास आनंद और अनुराग द्विवेदी ने भी सहभागिता की।
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