पुलवामा हमले की आरोपी इंशा जान की जमानत याचिका खारिज
- Sanjay Kulshrestha
- Aug 22, 2026
जम्मू, 22 अगस्त। वर्ष 2019 के पुलवामा आत्मघाती आतंकी हमले की आरोपी इंशा जान उर्फ इंशा तारिक को विशेष NIA अदालत से राहत नहीं मिली है। अदालत ने उसकी जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री आरोपों को प्रथम दृष्टया सही मानने के लिए पर्याप्त है। पुलवामा हमले में CRPF के 40 जवान शहीद हुए थे।
विशेष न्यायाधीश प्रेम सागर ने 20 अगस्त को सुनाए 15 पृष्ठों के आदेश में कहा कि आरोपी पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) की धारा 43-डी(5) के तहत जमानत संबंधी वैधानिक प्रतिबंध लागू होता है। मौजूदा चरण में उसे जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता।
दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के हरकीपोरा गांव की निवासी इंशा जान को उसके पिता पीर तारिक अहमद शाह के साथ 3 मार्च 2020 को गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ रणबीर दंड संहिता, UAPA, शस्त्र अधिनियम और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की विभिन्न धाराओं में मुकदमा चल रहा है। अदालत ने 10 दिसंबर 2022 को उसके खिलाफ आरोप तय किए थे।
आतंकियों को आश्रय और रसद देने का आरोप
NIA के आरोपपत्र के अनुसार इंशा जान पुलवामा हमले की कथित आतंकी साजिश में शामिल थी और पाकिस्तानी आतंकी मोहम्मद उमर फारूक के लगातार संपर्क में थी। उमर फारूक और एक अन्य पाकिस्तानी आतंकी मोहम्मद कामरान अली पर हमले की योजना तैयार करने का आरोप था। दोनों बाद में सुरक्षा बलों के साथ अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे गए थे।
जांच एजेंसी का आरोप है कि इंशा और उसके परिवार ने जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों को अपने घर में सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराने के साथ भोजन एवं अन्य रसद सहायता प्रदान की। आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार का वीडियो भी कथित तौर पर 28 और 29 जनवरी 2019 को इंशा के घर में रिकॉर्ड किया गया था। यह वीडियो 14 फरवरी के हमले के बाद प्रसारित हुआ था।
NIA के मुताबिक मई 2018 में एक पड़ोसी ने इंशा के परिवार का परिचय जैश आतंकियों से कराया था। जून 2018 में पाकिस्तानी आतंकी उमर फारूक और कामरान अली उसके घर आए। इसके बाद हथियारों और गोला-बारूद के साथ आतंकियों का घर पर आना-जाना शुरू हो गया।
एजेंसी का दावा है कि जनवरी 2019 में उमर फारूक, आदिल अहमद डार और समीर अहमद डार अत्याधुनिक हथियारों एवं गोला-बारूद के साथ इंशा के घर आए और कई दिनों तक वहां ठहरे थे।
NIA ने उमर फारूक के मारे जाने के बाद उसके मोबाइल फोन से बरामद कथित व्हाट्सएप कॉल, वॉयस नोट और तस्वीरों सहित दोनों के बीच हुए संवाद को भी अदालत के समक्ष रखा।
छह साल की हिरासत का दिया हवाला
बचाव पक्ष ने दलील दी कि इंशा छह वर्ष से अधिक समय से हिरासत में है और मुकदमे की सुनवाई में देरी हो रही है। अभियोजन पक्ष के कुल 240 गवाहों में से संबंधित समय तक केवल 49 गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे। ऐसे में मौजूदा गति से मुकदमा कई वर्षों तक चल सकता है।
बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि अब तक पेश हुए किसी गवाह ने इंशा को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपराध से नहीं जोड़ा और उसके पास से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई है। आरोपी ने खुद को मामले में झूठा फंसाए जाने का दावा किया।
स्वास्थ्य के आधार पर भी जमानत की मांग की गई। बचाव पक्ष के अनुसार इंशा त्वचा संबंधी पुरानी बीमारी, सर्वाइकल स्पॉन्डिलॉसिस और लगातार सिरदर्द से पीड़ित है तथा उसे विशेषज्ञ उपचार की आवश्यकता है।
NIA ने बताया गंभीर अपराध
NIA ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए इसे तथ्य और कानून की दृष्टि से निराधार बताया। एजेंसी ने अदालत में कहा कि आरोपी एक गंभीर और सुनियोजित आतंकी अपराध में सहयोगी रही है। उसके विरुद्ध जांच के दौरान पर्याप्त सामग्री एकत्र की गई है।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि UAPA की धारा 43-डी(5) के तहत आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती, क्योंकि उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया सही मानने के उचित आधार मौजूद हैं।
गवाहों को प्रभावित करने की आशंका
अदालत ने मुकदमे में देरी को भी जमानत देने का पर्याप्त आधार नहीं माना। न्यायाधीश ने कहा कि मामले की सुनवाई जारी है और गवाहों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं।
आदेश में कहा गया कि आरोपी को जमानत पर रिहा किए जाने की स्थिति में प्रमुख गवाहों को प्रभावित करने की आशंका है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
अदालत ने स्वास्थ्य संबंधी दलील भी खारिज करते हुए कहा कि आरोपी की बीमारी जानलेवा स्थिति नहीं है, जिसके आधार पर तत्काल जमानत दी जाए। हालांकि जेल प्रशासन को उसके लिए सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।
विशेष अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत याचिका पर निर्णय के दौरान की गई टिप्पणियों का मुख्य आपराधिक मुकदमे के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

