आदिवासी पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए चलेगा राज्यव्यापी अभियान, अक्टूबर-नवंबर में होगी 'आदिवासी बचाओ महारैली'
- DSS Admin
- Jun 29, 2026
रांची, 29 जून (हि.स.)। झारखंड की आदिवासी पहचान, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से सोमवार को धुर्वा स्थित पुराना विधानसभा सभागार में 'आदिवासियत संरक्षण संवाद' आयोजित किया गया। राज्य के विभिन्न जिलों से आए आदिवासी और झारखंडी संगठनों के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया। कार्यक्रम में आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए राज्यव्यापी जनजागरण अभियान चलाने का निर्णय लिया गया। साथ ही अक्टूबर-नवंबर में रांची में 'आदिवासी बचाओ महारैली' आयोजित करने की घोषणा की गई।
संवाद का आयोजन झारखंड जनाधिकार महासभा, आदिवासी अधिकार मंच, गांव गणराज्य परिषद, आदिवासी संघर्ष मोर्चा, आदिवासी समन्वय समिति और संयुक्त ग्राम सभा सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों ने संयुक्त रूप से किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने आरोप लगाया कि हाल के वर्षों में आदिवासी समाज की स्वतंत्र सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को कमजोर करने के प्रयास तेज हुए हैं। उनका कहना था कि आदिवासी समुदाय को 'वनवासी' के रूप में प्रस्तुत करना तथा उनकी स्वतंत्र धार्मिक पहचान और अलग धार्मिक कोड की मांग का विरोध करना इसी दिशा के प्रयास हैं।
वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज लंबे समय से अपनी पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था, जिसे झारखंड में 'सरना' के नाम से जाना जाता है, को आधिकारिक मान्यता देने और जनगणना में अलग धार्मिक कोड शामिल करने की मांग करता रहा है। उनका आरोप था कि कुछ संगठन इस मांग का विरोध कर आदिवासी पहचान को अन्य धार्मिक पहचान से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे आदिवासियत की स्वतंत्र पहचान प्रभावित हो सकती है।
संवाद में निर्णय लिया गया कि आदिवासी अधिकारों और पहचान की रक्षा के लिए गांव स्तर से राज्य स्तर तक चरणबद्ध अभियान चलाया जाएगा। इसके तहत विभिन्न प्रमंडलों और जिलों में सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे तथा व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। इसी अभियान के तहत अक्टूबर-नवंबर में रांची में 'आदिवासी बचाओ महारैली' आयोजित की जाएगी।
कार्यक्रम में बहादुर उरांव, बिंदु सोरेन, बहा लिंडा, चंद्र प्रभात मुंडा, दयामनी बारला, देवकी नंदन बेदिया, दामु मुंडा और ज्योति कुजूर सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों, संस्कृति, भाषा और पारंपरिक व्यवस्था के संरक्षण के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखा जाएगा।
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