राष्ट्रधर्म कार्यालय में ‘हिन्दू, हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति’ पर की गई पुस्तक चर्चा
लखनऊ, 01 जून (हि.स.)। जिसके कार्यों से किसी को कष्ट न पहुंचे। जो सभी प्राणियों को अपने जैसा ही मानता है। सबका सम्मान करता है। कण-कण में ईश्वर की अनुभूति करता है। जो अखंडता, निरन्तरता में विश्वास करता है, वह हिन्दू है। यह बातें राष्ट्रधर्म कार्यालय में सोमवार को आयोजित पुस्तक चर्चा में डॉ. ओमप्रकाश ने कही।
कार्यक्रम में प्रख्यात चिंतक, विद्वान आचार्य विद्यानिवास मिश्र की पुस्तक ‘हिन्दू, हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति’ पर चर्चा की गयी। चर्चा में डॉ. ओमप्रकाश ने अत्यन्त गम्भीर विषय-वस्तु को अत्यन्त सहज, सरल और स्पष्टता से सबके सामने रखा। उन्होंने कहा कि हिन्दू अपने को सर्वश्रेष्ठ नहीं मानता है, किन्तु वह किसी अन्य को भी सर्वश्रेष्ठ नहीं मानता है। क्योंकि उसका मानना है कि ईश्वर को पाने के अनेक मार्ग हैं जिनमें हिन्दुत्व भी एक है।
डॉ. ओमप्रकाश ने कहा कि हिन्दू कभी अधिकारों की बात नहीं करता है। वह केवल अपने कर्म पर ध्यान देता है। यही बात हमारे शास्त्रों में भी पुष्ट की गयी है। उन्होंने वैश्विक चिंतन की चर्चा करते हुए कहा कि जिनके विचार खंडित हैं वे हिन्दुत्व से घबराते हैं। क्योंकि हिन्दुत्व एकता की बात करता है। करुणा पर बल देता है। रहीम, रसखान, कबीर, निवेदिता, जायसी का उल्लेख करते हुए डॉ. ओमप्रकाश ने कहा कि हिन्दुत्व ने हमेशा विविधता को प्रश्रय दिया और ढोंग, दिखावा से दूरी बनाये रखी। कभी किसी विचारधारा के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया।
हिन्दू, हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति में आचार्य विद्यानिवास मिश्र ने हिन्दुत्व पर चिंतन-मंथन करते हुए कहा है कि हिन्दू वह है जो दूसरों के सुख को अपना सुख, दूसरा के दुःख को अपना दुःख माने। उन्होंने लिखा है- जो समाज, प्रकृति के अनुकूल है, वह संस्कृति है। जो इससे अलग है वह विकृति है।
डॉ. ओमप्रकाश ने पुस्तक में उद्धृत तथ्यों की विवेचना करते हुए कहा कि दूसरों के दुःख को दूर करना ही सबसे बड़ा धर्म है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रधर्म के निदेशक मनोज कांत ने की। कार्यक्रम में जयप्रकाश पाण्डेय, गौसिया खानम, बाबूलाल शर्मा, अमित कुशवाहा, राजीव द्विवेदी, मानवेन्द्र पंकज व अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
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