भागलपुर, 05 जून (हि.स.)।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर शुक्रवार को बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर के मृदा विज्ञान विभाग द्वारा भारतीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग योजना सोसायटी सबौर चैप्टर के सहयोग से “बिहार में उर्वरक खपत को कम करने की रणनीतियाँ” विषय पर एक विचार-मंथन सत्र का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का उद्देश्य कृषि उत्पादकता को बनाए रखते हुए उर्वरकों की खपत कम करने हेतु वैज्ञानिक, तकनीकी, जैविक एवं नीतिगत उपायों पर विचार-विमर्श करना था। यह कार्यक्रम डॉ. डी. आर. सिंह कुलपति बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर के संरक्षण में आयोजित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता एवं संचालन डॉ. अंशुमान कोहली, अध्यक्ष, मृदा विज्ञान विभाग ने किया। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. वाई. के. सिंह एवं डॉ. ए. के. झा., प्रोफेसर, मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विभाग थे।
सह-संयोजक के रूप में डॉ. सुनील कुमार एवं डॉ. श्वेता शाम्भवी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आयोजन सचिव डॉ. अनुपम दास तथा सह-आयोजन सचिव डॉ. इंगल एस. एन., डॉ. भबानी प्रसाद मंडल एवं डॉ. सरोज कुमार यादव ने कार्यक्रम के सफल आयोजन में योगदान दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह द्वारा पौधारोपण के साथ हुआ, जो पर्यावरण संरक्षण एवं सतत कृषि के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता का प्रतीक रहा। इस अवसर पर बिहार कृषि महाविद्यालय सबौर तथा कृषि जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय सबौर के राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवकों ने अपने कार्यक्रम पदाधिकारियों एवं समन्वयकों के साथ सक्रिय भागीदारी निभाई। स्वयंसेवकों ने पौधारोपण अभियान में सहयोग करते हुए पर्यावरण संरक्षण एवं हरित बिहार के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया।
इसके पश्चात अतिथियों का स्वागत एवं समूह छायाचित्र कार्यक्रम आयोजित किया गया। स्वागत भाषण में डॉ. अंशुमान कोहली ने बढ़ती उर्वरक लागत, घटती पोषक तत्व उपयोग दक्षता तथा पर्यावरणीय चुनौतियों के संदर्भ में संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया। मुख्य वक्ता डॉ. बिजय सिंह ने उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक अनुशंसा तथा प्रिसिजन न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। अपने संबोधन में कुलपति ने बिहार में कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक एवं टिकाऊ पोषक तत्व प्रबंधन रणनीतियों को अपनाने पर जोर दिया।
तकनीकी सत्र में विभिन्न विशेषज्ञों ने उर्वरक खपत कम करने से जुड़े विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रो. वी. पी. रमणी ने प्राकृतिक खेती एवं पोषक तत्व पुनर्चक्रण की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। डॉ. सत्येन्द्र कनौजिया ने “मिट्टी की मुस्कान” अवधारणा के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य सुधार एवं कम लागत वाले जैविक विकल्पों पर चर्चा की।
डॉ. संजय अरोड़ा ने सूक्ष्मजीव आधारित इनोकुलेंट्स की भूमिका को रेखांकित किया, जो पोषक तत्व उपलब्धता बढ़ाने एवं उर्वरक आवश्यकता कम करने में सहायक हैं। धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ तथा सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों, एन एस एस स्वयंसेवकों, आयोजकों एवं हितधारकों के योगदान की सराहना की गई।
---------------

