ऋग्वेद का पूर्णाहुति संग समापन, यजुर्वेद का हुआ आरंभ-योल में यज्ञानुष्ठान के 40वें दिन एकता का संदेश

Rigveda concludes with Purnahuti, Yajurveda begins – Message of unity on the 40th day of the Yajna ritual in Yol


कठुआ, 21 मई । वेद मन्दिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के महायज्ञानुष्ठान के 40वें दिन आध्यात्मिक वातावरण अत्यंत प्रेरणादायक रहा। इस अवसर पर स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने जिज्ञासुओं द्वारा प्रदीप्त अग्नि में आहुतियाँ डलवाकर ऋग्वेद के अंतिम मंत्र (10/191/4) के साथ ऋग्वेद का विधिवत समापन कराया तथा वायु ऋषि के हृदय में प्रकट हुए यजुर्वेद का शुभारंभ किया।

स्वामी जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि सृष्टि के आदि काल में परमेश्वर से उत्पन्न वेदवाणी ही समस्त ज्ञान और विज्ञान का अनंत स्रोत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मनुष्य का ज्ञान सीमित है जबकि परमेश्वर सर्वज्ञ है। ब्रह्मा से प्रारंभ हुई गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ही वेदज्ञान का पृथ्वी पर प्रसार हुआ। उन्होंने कहा कि परमात्मा ही एकमात्र सर्वस्वामी है जो ऋषि-मुनियों के माध्यम से मानव जीवन में सुखों की वर्षा करता है। वेदमार्ग पर चलकर ही मनुष्य ईश्वर को प्रसन्न कर उसे प्राप्त कर सकता है। इस अवसर पर स्वामी जी ने ऋग्वेद के अंतिम मंत्रों का अर्थ समझाते हुए समाज को एकता और सद्भाव का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्यों को अलग-अलग दलों में विभाजित होने के बजाय एक सूत्र में बंधकर रहना चाहिए जिससे संवाद बढ़े और विवाद समाप्त हो। उन्होंने जोर दिया कि सभी के विचार, कर्म और आचरण वेदों के अनुसार शुभ और समान हों।

स्वामी जी ने आगे कहा कि सभी मनुष्यों की ईश्वर के प्रति स्तुति, प्रार्थना और उपासना समान भाव से होनी चाहिए। उन्होंने अहंकार त्यागकर एकता, समानता और प्रेमभाव अपनाने की प्रेरणा दी। उनके अनुसार जब मनुष्य के हृदय में शुद्ध और सकारात्मक विचार उत्पन्न होंगे तभी समाज में सहयोग और सद्भाव का वातावरण बनेगा।

कार्यक्रम के दौरान उन्होंने ‘निदिध्यासन’ का महत्व भी बताया और कहा कि केवल सुनना और विचार करना पर्याप्त नहीं बल्कि उन शिक्षाओं को जीवन में अपनाना ही सच्चा धर्म है। उन्होंने विश्वास जताया कि वैदिक विचारों का श्रवण, मनन और आचरण ही विश्व में स्थायी शांति स्थापित कर सकता है। यज्ञानुष्ठान में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर वेद मंत्रों की आहुतियों के साथ आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया। कार्यक्रम का समापन शांति पाठ के साथ हुआ।

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