लेफ्टिनेंट गवर्नर ने ‘लाल डेड लिटरेरी अवॉर्ड’ समारोह में हिस्सा लिया और डॉ. वैदेही तमन की ‘लाल डेड’ पर लिखी किताब लॉन्च की

युवा ही हमारे भविष्य के निर्माता : एलजी सिन्हा
सिर्फ़ साधारण उपलब्धियों से संतुष्ट न हों। बड़े सपने देखें, कड़ी मेहनत करें और बेहतरीन काम करने की कोशिश करें। हमारे देश की सफलता का सफऱ धैर्य, कड़ी मेहनत और सामूहिक प्रयासों से ही तय होता है : युवा पीढ़ी से एलजी का आव्हान
मैं समाज से दो ज़रूरी काम करने का आग्रह करता हूँ- पहला, अपनी विरासत का वह हिस्सा ढूँढ़ें जिसे आप जिंदगी की भागदौड़ में कहीं खो चुके हैं—चाहे वह कोई भाषा हो, गाना हो, कोई रेसिपी हो, कहानी हो या कोई परंपरा। उसे फिर से अपनाएँ और अगली पीढ़ी को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें। दूसरा, याद रखें कि हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारी सांस्कृतिक पहचान है, जो सदियों से एक जलती हुई मशाल की तरह हमें सौंपी गई है। मैं युवाओं से अपील करता हूँ कि उस लौ को बुझने न दें। अब समय आ गया है कि हम अपनी विरासत का इस्तेमाल करके लाखों नई लौ जलाएँ
श्रीनगर, स्टेट समाचार
उपराज्यपाल श्री मनोज सिन्हा ने आज ‘लाल डेड साहित्य पुरस्कार’ समारोह और डॉ. वैदेही टमन की नई किताब ‘लाल डेड : द मदर ऑफ़ कश्मीर’ के विमोचन कार्यक्रम में हिस्सा लिया। उन्होंने पुरस्कार पाने वालों से कहा कि वे लाल डेड, कबीर, नंद ऋषि, गुरु नानक और तुलसीदास की कालजयी सीख को युवा पीढ़ी तक पहुँचाएँ। इस मौके पर उपराज्यपाल ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने विज्ञान और गहरे आध्यात्मिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाकर भारत का निर्माण किया था; उन्होंने ज़ोर दिया कि तरक्की के लिए वैज्ञानिक और आध्यात्मिक, दोनों तरह के लोगों की ज़रूरत होती है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी समृद्ध आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक पहचान है, जो सदियों से एक मशाल की तरह आगे बढ़ती रही है। मैंने युवाओं से अपील की कि वे उस लौ को बुझने न दें। अब समय आ गया है कि हम अपनी समृद्ध विरासत का इस्तेमाल लाखों नए लोगों को प्रेरित करने के लिए करें। अब समय है नई सोच अपनाने और जम्मू-कश्मीर के युवाओं को एक आत्मनिर्भर केंद्र-शासित प्रदेश बनाने का स्पष्ट मकसद देने का।
राष्ट्र-निर्माण हर नागरिक की सामूहिक ज़िम्मेदारी है। युवा ही हमारे भविष्य के निर्माता हैं। साधारण उपलब्धियों से संतुष्ट न हों। बड़े सपने देखें, कड़ी मेहनत करें और उत्कृष्टता के लिए प्रयास करें। हमारे देश की यात्रा धैर्य, कड़ी मेहनत और सामूहिक प्रयासों से ही सफल होती है," उपराज्यपाल ने कहा।
उपराज्यपाल ने कहा कि भारत बाहरी तरक्की और आंतरिक आध्यात्मिक विकास, दोनों को महत्व देता है। उन्होंने कहा कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक की यात्रा यह दिखाती है कि हमारी मूल परंपराएँ आज भी जीवित हैं और यह साझा आध्यात्मिक विरासत हमारे समाज का मार्गदर्शन करती है और हर भारतीय को जोड़ती है। "मैं चाहता हूँ कि लेखक, विचारक और कलाकार इस आध्यात्मिक परंपरा को बचाकर रखें और इसे आगे बढ़ाएँ। मेरा यह मतलब नहीं है कि हम अतीत में ही जिएँ, बल्कि यह है कि हम अपनी विरासत की सच्चाई, अच्छाई और गरिमा का सम्मान करें। हम अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भी दुनिया के लिए खुले रह सकते हैं—ठीक वैसे ही जैसे मज़बूत जड़ों वाला पेड़ हवा का सामना करते हुए भी बढ़ता रहता है।
मैं समाज से दो ज़रूरी काम करने का आग्रह करता हूँ- पहला, अपनी विरासत का वह हिस्सा ढूँढ़ें जिसे आप जिंदगी की भागदौड़ में कहीं खो चुके हैं—चाहे वह कोई भाषा हो, गाना हो, कोई रेसिपी हो, कहानी हो या कोई परंपरा। उसे फिर से अपनाएँ और अगली पीढ़ी को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें। दूसरा, याद रखें कि हमारी 
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सबसे बड़ी ताकत हमारी सांस्कृतिक पहचान है, जो सदियों से एक जलती हुई मशाल की तरह हमें सौंपी गई है। मैं युवाओं से अपील करता हूँ कि उस लौ को बुझने न दें। अब समय आ गया है कि हम अपनी विरासत का इस्तेमाल करके लाखों नई लौ जलाएँ, उपराज्यपाल ने कहा।
उन्होंने लेखकों, शिक्षकों और कलाकारों के काम की तारीफ़ की और कहा कि आज सम्मानित किए गए लोगों ने अपने असाधारण काम से हमारे देश को समृद्ध किया है।
वे समाज के लिए मार्गदर्शक हैं और यह साबित करते हैं कि असली उत्कृष्टता का पैमाना वह सकारात्मक प्रभाव है जो हम आने वाली पीढय़िों पर छोड़ते हैं। चाहे लेखन, शिक्षण, कला या जनसेवा के ज़रिए हो, वे हमारे साझा भविष्य को आकार देते हैं। तेज़ी से बदलती इस दुनिया में हमें लेखकों और शिक्षकों की पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है। वे नए विचार पैदा करते हैं, ज्ञान को सहेजते हैं और युवाओं का मार्गदर्शन करते हैं। साहित्य हमें संवेदनशील बनाता है और शिक्षा हमें ज्ञान देती है। ये दोनों मिलकर ऐसे ज़िम्मेदार नागरिक तैयार करते हैं जो देश को आगे ले जा सकते हैं," उपराज्यपाल ने कहा।
उपराज्यपाल ने आगे कहा कि युवा पीढ़ी परंपरा और आधुनिकता के संगम पर खड़ी है। उन्होंने कहा कि युवाओं के हाथों में तकनीक तो है, लेकिन उनके मन नए मकसद की तलाश में हैं। "यह हमारे लेखकों का फर्ज़़ है कि वे युवाओं को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ें और उन्हें एक मकसद और नए लक्ष्य के साथ सीमाओं से परे सोचने के लिए प्रेरित करें। यह हमारे शिक्षकों की ज़िम्मेदारी है कि वे युवाओं को न केवल कौशल सिखाएँ, बल्कि भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए संस्कार, आत्मविश्वास और साहस भी दें। अगर साहित्य और शिक्षा साथ-साथ चलें, तो देश की तरक्की न केवल भौतिक होगी, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक भी होगी," उन्होंने कहा।
इस मौके पर उपराज्यपाल ने बुद्धिजीवियों, लेखकों, शिक्षकों, वैज्ञानिकों और रचनाकारों से पाँच आग्रह किए। युवाओं को स्वतंत्र रूप से सोचने और सच्चाई की खोज करने के लिए प्रोत्साहित करें; अपनी समृद्ध संस्कृति को संजोएं और साझा करें, जो वैश्विक दुनिया में हमारी सबसे बड़ी ताकत है; विचारों को किताबों से बाहर निकालें और उनका इस्तेमाल असल दुनिया की समस्याओं को हल करने में करें; देश की सेवा के लिए अगली पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए अपने अनुभव साझा करें और जलवायु परिवर्तन जैसी जटिल चुनौतियों से निपटने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों की विशेषज्ञता को मिलाएं।
उपराज्यपाल ने कहा, "राष्ट्र-निर्माण एक सामूहिक जिम्मेदारी है। एक मजबूत अर्थव्यवस्था बुनियादी ढांचा तो बना सकती है, लेकिन केवल जिम्मेदार नागरिक ही उसकी रक्षा कर सकते हैं। युवा हमारे भविष्य के निर्माता हैं। साधारण उपलब्धियों से संतुष्ट न हों। बड़े सपने देखें, कड़ी मेहनत करें और उत्कृष्टता के लिए प्रयास करें। हमारे देश की यात्रा धैर्य, कड़ी मेहनत और सामूहिक प्रयासों से सफल होती है।"
लाल डेड जैसी महान हस्तियों को समर्पित एक संग्रहालय बनाने के अनुरोध पर उपराज्यपाल ने आश्वासन दिया कि इस संबंध में उचित कदम उठाए जाएंगे।
इस पुरस्कार समारोह में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री तीरथ सिंह रावत; पूर्व सांसद और एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे; प्रख्यात लेखिका प्रो. नीरजा मट्टू; लेखिका डॉ. वैदेही तमन और साहित्य जगत की प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं।

   

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