कलियुग के दुखों से मुक्ति का मार्ग-वेदों की शरण में लौटने का आह्वान

The path to liberation from the sufferings of Kaliyuga – a call to return to the refuge of the Vedas


कठुआ, 20 मई । वेद मंदिर, योल में आयोजित 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 39वें दिन योगाचार्य स्वामी राम स्वरूप जी ने ऋग्वेद मन्त्र 10/68/3 के माध्यम से उपस्थित जिज्ञासुओं को वेद ज्ञान का महत्व समझाया।

उन्होंने बताया कि सृष्टि के आरंभ में परमात्मा ने ऋषियों के हृदय में जनकल्याणकारी, दोषों का नाश करने वाली वेद वाणियों का प्रकाश किया। ये वेद वाणियां ध्यान के माध्यम से प्राप्त होती हैं और ऋषि-मुनियों द्वारा अनादि काल से जन-जन तक पहुंचाई जाती रही हैं। स्वामी जी ने कहा कि प्रारंभ में ईश्वर ने चार ऋषियों को वेद ज्ञान प्रदान किया जिनसे यह ज्ञान ब्रह्मा तक पहुंचा और फिर गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से सामान्य मानव तक प्रसारित हुआ। इस दिव्य ज्ञान के प्रभाव से सतयुग, त्रेता और द्वापर युग में मानव समाज सुखी, निरोग और आनंदमय जीवन जीता था।

उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कलियुग के प्रारंभ से ही मनुष्य ने वेद वाणी का त्याग कर दिया जिससे समाज में दुख और अशांति का वातावरण बढ़ा। वेद-विरोधी तत्वों ने लोगों को मूल सत्य से भटकाकर अलग-अलग भक्ति मार्गों में उलझा दिया जिसके कारण मानव स्वयं ही अपने दुखों का कारण बन गया। स्वामी राम स्वरूप जी ने आह्वान किया कि यदि समाज को पुनः सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त करनी है तथा देश को “सोने की चिड़िया” और “विश्व गुरु” के रूप में स्थापित करना है तो वेदों की ओर लौटना अनिवार्य है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं जिज्ञासु उपस्थित रहे और यज्ञानुष्ठान के माध्यम से आध्यात्मिक वातावरण बना रहा।

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