खाते-पीते घर का बच्चा... या चलता-फिरता बर्गर?

आज की कहानी उन नन्हे-मुन्ने महाराजाओं और महारानियों की है जिनका घर में ऐसा रुतबा है कि प्रधानमंत्री भी देखकर सोचें, "भाई, इतनी पावर तो मेरे पास भी नहीं!" बस बच्चे ने एक बार मुंह खोला, "मम्मी... मैगी खानी है।" मम्मी बोली, "दो मिनट।" बच्चा बोला, "पापा... पिज्जा चाहिए।" पापा बोले, "अभी आया।" बच्चा बोला, "बर्गर भी।" पापा बोले, "दो ले आते हैं, एक छोटा पड़ गया तो?" बच्चा बोला, "कोल्ड ड्रिंक भी।" मम्मी बोली, "बेटा, बड़ी वाली या फैमिली पैक?" अब बेचारा बच्चा क्या करे, उसे तो समझ ही नहीं आता कि घर में मां-बाप हैं या चौबीस घंटे खुली फास्ट फूड की दुकान।
आजकल बच्चों का दिमाग कम और जीभ ज्यादा काम करती है। पेट बेचारा हाथ जोडक़र कहता है, "भाई, कभी दाल-रोटी भी भेज दिया करो।" लेकिन जीभ कहती है, "चुप रहो, आज चीज़ बर्स्ट पिज्जा आएगा।" शरीर कहता है, "थोड़ा फल खा लो।" बच्चा कहता है, "फल? वो किस कंपनी का बर्गर है?" अब हालत यह हो गई है कि बच्चे को सेब दिखाओ तो पूछता है, "इसमें चीज़ कहाँ है?" केला दिखाओ तो कहता है, "इसका नया फ्लेवर कब आया?"
हमारे समय में भी बच्चे शैतान थे, लेकिन शैतानी का तरीका अलग था। सुबह घर से निकलो तो मां चिल्लाती रहती थी, "अरे खाना तो खा ले।" और हम कहते थे, "बाद में।" फिर गली में क्रिकेट, कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा, पतंग, साइकिल, पेड़ पर चढऩा, नाले के ऊपर से कूदना, धूल में लोटना, शाम तक पसीना बहाना। घर लौटते थे तो मां कहती थी, "कौन सी मिट्टी खाकर आए हो?" लेकिन भूख ऐसी लगती थी कि सूखी रोटी और प्याज भी पाँच सितारा होटल का खाना लगती थी।
आज का बच्चा सुबह उठते ही सबसे पहले मोबाइल ढूंढता है। फिर कहता है, "मम्मी, आज स्कूल जाने का मन नहीं है।" मम्मी कहती है, "कोई बात नहीं बेटा, आराम कर ले।" हमारे समय में अगर हम यह बोल देते तो मम्मी आराम नहीं देती थीं, झाड़ू देती थीं। पांच मिनट में स्कूल जाने का मन भी आ जाता था और दौडऩे का भी।
फिर बच्चा कहता है, "मम्मी, मैगी बना दो।" दो मिनट में मैगी। फिर कहता है, "अब बर्गर चाहिए।" थोड़ी देर बाद, "पास्ता चाहिए।" फिर, "पिज्जा चाहिए।" फिर, "हॉट डॉग चाहिए।" ऐसा लगता है जैसे बच्चा नहीं, होटल का मेन्यू बोल रहा हो। घर की दाल देखकर उसका चेहरा ऐसा बन जाता है जैसे किसी ने बिजली का बिल पकड़ा दिया हो।
मां-बाप भी बड़े खुश होते हैं। कहते हैं, "हमारा बच्चा जो मांगेगा, वही मिलेगा।" अरे भाई, प्यार करना बहुत अच्छी बात है, लेकिन प्यार और परवरिश में थोड़ा फर्क भी होता है। बच्चा अगर रोज़ मिठाई मांगे तो क्या सुबह-शाम रसगुल्ले ही खिलाओगे? अगर बच्चा बोले कि मुझे दिनभर मोबाइल चाहिए तो क्या दे दोगे? फिर खाने के मामले में इतनी जल्दी हार क्यों मान लेते हो?
कल एक बच्चा मिला। बच्चा कम, चलता-फिरता तकिया ज्यादा लग रहा था। मोटापा भी कई तरह का होता है। एक हल्का मोटापा, एक ज्यादा मोटापा और एक ऐसा मोटापा कि कुर्सी भी बैठने से पहले भगवान को याद करे। वह अपनी मम्मी के साथ था। चलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन दो कदम चलकर हांफ गया। आखिर में मम्मी ने ऑटो रोक लिया। ऑटो वाला भी पहले बच्चे को देख रहा था, फिर ऑटो को, फिर अपने टायरों को। शायद सोच रहा था, "हे भगवान, आज मेरी परीक्षा है।"
मुझसे रहा नहीं गया। मैंने धीरे से पूछा, "बहन जी, बच्चे की सेहत का थोड़ा ध्यान रखिए।" उन्होंने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने उनसे घर का कागज मांग लिया हो। फिर मुस्कुराकर बोलीं, "हम खाते-पीते घर के हैं, तुम्हारी तरह नहीं।" बस, मैं भी मुस्कुरा दिया। मन में सोचा, "बहन जी, खाते-पीते घर के होना अच्छी बात है, लेकिन अगर बच्चा चलता-फिरता गोलगप्पा बन जाए तो डॉक्टर भी खाते-पीते घर का ही बिल बनाएगा।"
आजकल मां-बाप बच्चों को खुश करने के लिए सब कुछ खरीद लेते हैं, लेकिन सबसे जरूरी चीज़ खरीदना भूल जाते हैं, और वह है अच्छी आदत। बच्चा अगर रोज़ बाहर का खाना खाएगा, दिनभर मोबाइल चलाएगा, खेलना छोड़ देगा, दौडऩा छोड़ देगा, पसीना बहाना छोड़ देगा, तो फिर शरीर भी एक दिन कहेगा, "भाई, मैं भी छुट्टी पर जा रहा हूँ।"
बच्चों को प्यार जरूर दीजिए, लेकिन प्यार के साथ समझ भी दीजिए। कभी उनके साथ पार्क जाइए, कभी क्रिकेट खेलिए, कभी साइकिल चलाइए, कभी रस्सी कूदिए, कभी योग कराइए। उन्हें बताइए कि असली सुपरहीरो वह नहीं जो सबसे बड़ा बर्गर खा जाए, बल्कि वह है जो सबसे तेज दौड़ जाए। असली जीत पिज्जा खत्म करने में नहीं, बल्कि मैदान के चार चक्कर लगाने में है। वरना आने वाला समय ऐसा होगा कि बच्चा डॉक्टर से पूछेगा, "डॉक्टर अंकल, मैं कब ठीक होऊंगा?" और डॉक्टर मुस्कुराकर कहेगा, "जिस दिन मैगी, पिज्जा, बर्गर और मोबाइल से छुट्टी लेकर दाल, रोटी, फल और मैदान से दोस्ती कर लोगे, उसी दिन आधी बीमारी अपने आप भाग जाएगी।" इसलिए बच्चों को सिर्फ स्वाद का नहीं, सेहत का भी शौक लगाइए, क्योंकि जीभ की खुशी दो मिनट की होती है, लेकिन अच्छी सेहत पूरी जिंदगी साथ निभाती है।

   

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